
देशभर में केंद्रीय ट्रेड यूनियनों और किसान संगठनों के आह्वान पर भारत बंद के तहत व्यापक हड़ताल और प्रदर्शन हुए। चार श्रम संहिताओं को रद्द करने, बिजली व बीज विधेयक वापस लेने, पुरानी पेंशन बहाली और महंगाई नियंत्रण जैसी मांगें प्रमुख रहीं। केरल, पंजाब और तमिलनाडु में बंद का असर अधिक दिखा, जबकि पश्चिम बंगाल में स्थिति सामान्य रही। संसद में भी विपक्ष ने समर्थन जताया। यह बंद संकेत देता है कि श्रमिक और किसान मुद्दे आने वाले समय में राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में रहेंगे।
भारत बंद: श्रमिक और किसान संगठनों का राष्ट्रव्यापी विरोध, कई राज्यों में दिखा व्यापक असर
केंद्रीय श्रमिक संगठनों और किसान समूहों के आह्वान पर आज देशभर में भारत बंद के तहत व्यापक हड़ताल और प्रदर्शन देखने को मिले। दस केंद्रीय ट्रेड यूनियनों के साझा मंच द्वारा बुलाए गए इस बंद को कई किसान संगठनों, छात्र समूहों और युवा संगठनों का समर्थन प्राप्त हुआ।
श्रमिक संगठनों का आरोप है कि केंद्र सरकार की मौजूदा नीतियां मजदूरों और किसानों के हितों के विपरीत हैं तथा बड़ी कंपनियों को लाभ पहुंचाने वाली हैं। इसी के विरोध में यह राष्ट्रव्यापी कदम उठाया गया, जिसे आयोजकों ने “नीतिगत बदलाव की चेतावनी” बताया है।
मुख्य मांगें: श्रम संहिताओं से लेकर महंगाई तक
आज की हड़ताल के केंद्र में कई अहम मांगें रहीं। प्रदर्शनकारियों ने चार श्रम संहिताओं को रद्द करने की मांग को प्रमुखता से उठाया। उनका कहना है कि इन संहिताओं से श्रमिक अधिकार कमजोर हुए हैं और नौकरी की सुरक्षा कम हुई है।
इसके अलावा बिजली संशोधन विधेयक 2025 और बीज विधेयक 2025 को वापस लेने की मांग की गई। किसान संगठनों का तर्क है कि इन विधेयकों से कृषि क्षेत्र में निजीकरण और कॉरपोरेट हस्तक्षेप बढ़ेगा।
नए परमाणु ऊर्जा परियोजनाओं को रोकने, पुरानी पेंशन योजना बहाल करने, मजदूरों के लिए न्यूनतम वेतन सुनिश्चित करने और मनरेगा के लिए अधिक बजट आवंटन की मांग भी प्रमुख रही।साथ ही पेट्रोल, डीजल, रसोई गैस और आवश्यक वस्तुओं की कीमतें कम करने की मांग ने भी प्रदर्शन को व्यापक जनसमर्थन देने की कोशिश की।
विभिन्न क्षेत्रों पर असर: आंशिक बाधाएं, जरूरी सेवाएं जारी
हड़ताल के कारण बैंकिंग, बीमा, डाक, परिवहन, खनन, गैस पाइपलाइन और बिजली जैसे क्षेत्रों में आंशिक व्यवधान की आशंका जताई गई थी। कई स्थानों पर इसका असर भी देखने को मिला।हालांकि अस्पताल, आपात सेवाएं, निजी कार्यालय, मेट्रो सेवा और आवश्यक आपूर्ति सेवाएं अधिकांश स्थानों पर चालू रहीं, जिससे आम लोगों को बड़ी कठिनाइयों से बचाया जा सका।रेल और सड़क परिवहन पर कुछ स्थानों पर असर देखने को मिला, जबकि प्रशासन ने कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए अतिरिक्त पुलिस बल तैनात किया।
राज्यों में असर: केरल में ठप परिवहन, पंजाब-तमिलनाडु में समर्थन, बंगाल में सामान्य स्थिति
केरल
केरल में बंद का व्यापक प्रभाव देखने को मिला। सरकारी और निजी बसें सड़कों से लगभग नदारद रहीं, जिससे कार्यालयों में उपस्थिति कम रही। राज्य सरकार ने पहले ही स्पष्ट कर दिया था कि बिना अनुमति अनुपस्थित रहने पर वेतन काटा जा सकता है।
ऑटो यूनियनों ने भी सेवाएं बंद रखीं। हालांकि कोच्चि मेट्रो और ऑनलाइन टैक्सी सेवाएं चालू रहीं, जिससे कुछ राहत मिली। शबरिमला जाने वाले श्रद्धालुओं के लिए विशेष बसें चलाने की व्यवस्था की गई।तमिलनाडु-केरल अंतरराज्यीय बस सेवा पूरी तरह ठप रही, जिससे कन्याकुमारी और सीमा क्षेत्रों के यात्रियों को परेशानी उठानी पड़ी।
ओडिशा
ओडिशा में ट्रेड यूनियनों ने रैलियां और प्रदर्शन किए। बालासोर रेलवे स्टेशन पर कुछ कार्यकर्ताओं द्वारा ट्रेन रोकने की कोशिश के कारण रेल सेवा कुछ समय के लिए प्रभावित हुई, हालांकि प्रशासन ने स्थिति नियंत्रित कर ली।
पंजाब
पंजाब में बंद को मजबूत समर्थन मिला। सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी ने भी समर्थन जताया। कई स्थानों पर किसान और मजदूर संयुक्त रूप से धरनों और रैलियों में शामिल हुए।
तमिलनाडु
द्रमुक ने भी बंद का समर्थन किया और आरोप लगाया कि किसान एवं मजदूर हितों से जुड़े कानून पर्याप्त चर्चा के बिना लाए गए। मदुरै सहित कई शहरों में संयुक्त कार्यक्रम आयोजित किए गए।
पश्चिम बंगाल
इसके विपरीत पश्चिम बंगाल में बंद का असर अपेक्षाकृत हल्का रहा। कोलकाता और अन्य जिलों में सार्वजनिक परिवहन सामान्य रहा, कार्यालय खुले रहे और स्कूलों में भी सामान्य उपस्थिति देखी गई। हालांकि छात्र संगठनों ने कुछ विश्वविद्यालयों के बाहर प्रदर्शन किया।
संसद से सड़क तक विरोध: व्यापार समझौते पर भी उठे सवाल
संसद परिसर में विपक्षी सांसदों ने श्रमिक संगठनों के बंद के समर्थन में प्रदर्शन किया। उन्होंने भारत-अमेरिका व्यापार समझौते का विरोध करते हुए सरकार पर राष्ट्रीय हितों से समझौता करने का आरोप लगाया।सांसदों ने समझौते की शर्तों को सार्वजनिक करने की मांग की और इसे श्रमिक व किसान हितों के खिलाफ बताया। इस विरोध ने बंद को राजनीतिक आयाम भी दे दिया।
निष्कर्ष: क्या बदलेगी नीति की दिशा?
श्रमिक संगठनों का दावा है कि करोड़ों मजदूर इस आंदोलन से जुड़े हैं और यह केवल एक दिन का प्रतीकात्मक विरोध नहीं बल्कि नीतिगत बदलाव की मांग का संकेत है।आज का भारत बंद यह दर्शाता है कि रोजगार, मजदूरी, कृषि नीति और जनकल्याण से जुड़े मुद्दे राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में हैं। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार इन मांगों पर संवाद का रास्ता अपनाती है या टकराव की स्थिति और गहराती है।







