
बांदा : उत्तर प्रदेश के बांदा से आई यह खबर सिर्फ एक अपराध की सूचना नहीं, बल्कि इंसानियत को झकझोर देने वाली वह दर्दनाक सच्चाई है, जिसमें 34 मासूम बच्चियों और बच्चों का बचपन बेरहमी से कुचल दिया गया। विशेष पॉक्सो अदालत ने सिंचाई विभाग के निलंबित जेई रामभवन और उसकी पत्नी दुर्गावती को फांसी की सजा सुनाते हुए साफ कहा कि उन्होंने ऐसा जघन्य अपराध किया है, जिसके लिए समाज में कोई दया या नरमी नहीं हो सकती।
वे मासूम, जिनके हाथों में किताबें और खिलौने होने चाहिए थे, उन्हें दरिंदगी के अंधेरे में धकेल दिया गया। आरोपी महिला दुर्गावती बच्चियों को खिलौनों, टॉफियों और खाने का लालच देकर अपने घर ले जाती थी। विश्वास में लेने के बाद, वह उन्हें अपने पति के हवाले कर देती। इसके बाद मासूम बच्चियों के साथ ऐसी दरिंदगी होती, जिसे शब्दों में बयान करना भी मुश्किल है। बच्चियां रोतीं, गिड़गिड़ातीं, लेकिन उन्हें पीटा जाता, कमरे में बंद कर दिया जाता और कई दिनों तक बंधक बनाकर रखा जाता।
जांच में सामने आया कि आरोपी दंपती न केवल बच्चियों का यौन शोषण करते थे, बल्कि उनकी अश्लील तस्वीरें और वीडियो भी बनाते थे। यह सामग्री डार्कवेब के जरिए विदेशों में बेची जाती थी। इस घिनौने अपराध का पर्दाफाश तब हुआ, जब इंटरपोल ने केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो को ई-मेल के माध्यम से सूचना दी। इसके बाद सीबीआई ने महीनों तक जांच की, छापेमारी की और आरोपी दंपती को गिरफ्तार किया।
जब पीड़ित बच्चियों को इलाज के लिए अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) ले जाया गया, तो डॉक्टर भी उनकी हालत देखकर स्तब्ध रह गए। किसी बच्ची की आंख तिरछी हो चुकी थी, किसी की भौंह अपनी जगह से हट गई थी, और कई बच्चियों के शरीर के नाजुक अंग गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त पाए गए। ये सिर्फ शारीरिक जख्म नहीं थे, बल्कि उनकी आत्मा पर लगे ऐसे घाव थे, जो शायद जिंदगी भर नहीं भर पाएंगे।
सीबीआई की 990 पन्नों की रिपोर्ट में खुलासा हुआ कि आरोपी दंपती इस अपराध को लंबे समय से अंजाम दे रहे थे। उनके घर से 10 मोबाइल फोन, 2 लैपटॉप, मेमोरी कार्ड, पेन ड्राइव, डिजिटल कैमरा और सैकड़ों अश्लील फोटो-वीडियो बरामद हुए। हर तस्वीर एक मासूम की चीख थी, हर वीडियो एक टूटे हुए बचपन की कहानी।
जब बच्चियां कोर्ट में बयान देने पहुंचीं, तो उनकी आंखों में डर साफ दिखाई दे रहा था। वे कांप रही थीं, सहमी हुई थीं और बार-बार चुप हो जा रही थीं। उनकी खामोशी ही उनकी सबसे बड़ी गवाही थी। उन्होंने बताया कि उन्हें पीटा जाता था, डराया जाता था और उनकी कोई मदद करने वाला नहीं था।
अदालत ने अपने फैसले में कहा कि यह अपराध दुर्लभ से दुर्लभतम श्रेणी का है। दोषियों का नैतिक स्तर पूरी तरह गिर चुका है और उनमें सुधार की कोई संभावना नहीं है। अदालत ने उत्तर प्रदेश सरकार को हर पीड़ित बच्चे को 10-10 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश भी दिया है।
दोषियों को भले ही फांसी की सजा मिल गई हो, लेकिन यह फैसला उन मासूम बच्चियों का खोया हुआ बचपन वापस नहीं ला सकता। उनके दिल में बैठा डर, उनकी आंखों में छिपा दर्द और उनकी टूटी हुई मासूमियत समाज से एक सवाल पूछ रही है— आखिर उनका कसूर क्या था ।






