
- 6 महीने बाद भी नहीं मिली जानकारी, अपीलकर्ता पहुंचा सूचना आयोग
- सूचना नहीं, बहाने मिले: अपीलकर्ता ने विभाग पर लगाए गंभीर आरोप
देहरादून: सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के तहत एक अपीलकर्ता द्वारा सूचना एवं लोक संपर्क विभाग के खिलाफ गंभीर आरोप लगाए गए हैं, जिनमें सूचना देने में लापरवाही, भ्रामक उत्तर, नियमों की अनदेखी और प्रथम अपीलीय आदेश की अवहेलना जैसे मुद्दे शामिल हैं। अपीलकर्ता के अनुसार, उन्होंने अक्टूबर और नवंबर 2025 के दौरान विभाग को पांच अलग-अलग पत्र भेजे थे, जिनमें विभिन्न मामलों पर कार्यवाही की मांग की गई थी। इन सभी पत्रों की सत्यापित प्रतियां भी संलग्न की गई थीं।
अपीलकर्ता का कहना है कि 26 नवंबर 2025 को उन्होंने सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत आवेदन देकर इन पत्रों की छायाप्रतियां और उन पर हुई कार्यवाही का विवरण मांगा था, लेकिन लोक सूचना अधिकारी (PIO) द्वारा 16 दिसंबर 2025 को जो उत्तर दिया गया, वह अपूर्ण, अस्पष्ट और भ्रामक था। आरोप है कि मांगी गई वास्तविक जानकारी—जैसे प्रमाणित दस्तावेज, फाइल नोटिंग, डायरी/रजिस्टर नंबर और कार्यवाही विवरण—उपलब्ध नहीं कराए गए।
आवेदन के पांचों बिंदुओं पर PIO का जवाब अस्पष्ट बताया गया है। अपीलकर्ता का कहना है कि उनके किसी भी पत्र में अनुमानित तिथि का उल्लेख नहीं था, फिर भी PIO ने “अनुमान के आधार पर सूचना देना संभव नहीं” कहकर जवाब टाल दिया, जो कि सूचना अधिकार अधिनियम की धारा 7(1) का उल्लंघन है।
मामले में यह भी सामने आया कि जब अपीलकर्ता ने व्यक्तिगत रूप से PIO से मुलाकात की, तो उन्हें बताया गया कि वे स्वयं किसी प्रकार का विश्लेषण या व्याख्या नहीं कर सकते और आवेदन को संबंधित विभाग को भेजा जाएगा। जबकि अधिनियम की धारा 5(4) के अनुसार, PIO को अन्य अधिकारियों से सहायता लेकर सूचना उपलब्ध करानी होती है।
इससे असंतुष्ट होकर अपीलकर्ता ने 22 दिसंबर 2025 को प्रथम अपील दायर की। प्रथम अपीलीय अधिकारी ने 16 जनवरी 2026 को सुनवाई की, लेकिन अपीलकर्ता का आरोप है कि आदेश में विभाग का पक्ष लेते हुए सूचना को निशुल्क देने के बजाय सशुल्क देने का निर्देश दिया गया, जो अधिनियम की धारा 7(6) के विपरीत है। इस धारा के अनुसार, यदि 30 दिनों के भीतर सूचना उपलब्ध नहीं कराई जाती, तो उसे निशुल्क देना अनिवार्य होता है।
आरोप यह भी है कि बाद में PIO ने अपीलकर्ता से ही उनके पत्रों की व्याख्या लिखकर देने को कहा, जबकि अधिनियम की धारा 2(एफ) और 2(जे) के अनुसार, सूचना वही है जो रिकॉर्ड में उपलब्ध है—न कि कोई नई व्याख्या तैयार करना।
अपीलकर्ता ने विस्तृत रूप से पांचों बिंदुओं में अनियमितताओं का उल्लेख किया है। पहले बिंदु में उन्होंने आरोप लगाया कि विभाग ने नियमावली दिखाकर मूल नियम देने से बचने की कोशिश की और गैर-सूचीबद्ध पत्रिकाओं को लाखों रुपये के विज्ञापन किस आधार पर दिए गए, इसका कोई स्पष्ट जवाब नहीं दिया। दूसरे बिंदु में बिना पंजीयन प्रमाण पत्र वाले समाचार पत्र को लाखों रुपये के विज्ञापन देने पर सवाल उठाया गया, जिसका संतोषजनक उत्तर नहीं मिला।
तीसरे बिंदु में अपीलकर्ता ने अपने ही समाचार पत्र से संबंधित विज्ञापन की फाइल और आदेश की प्रतियां मांगी थीं, लेकिन जवाब में “अन्य प्रकरण में गतिमान” बताकर सूचना देने से बचा गया। चौथे और पांचवें बिंदु में विभाग पर यह आरोप है कि मूल प्रश्नों को बदलकर उनके स्थान पर व्याख्या आधारित उत्तर दिए गए और संबंधित पत्रों की स्थिति तक स्पष्ट नहीं की गई।
विशेष रूप से पांचवें बिंदु में विरोधाभासी स्थिति सामने आई, जहां PIO ने कहा कि सूचना सीएम पोर्टल के माध्यम से दे दी गई है, जबकि संबंधित अधिकारी ने दावा किया कि सूचना पहले ही आरटीआई के माध्यम से दी जा चुकी है। अपीलकर्ता का कहना है कि दोनों ही दावे तथ्यात्मक रूप से गलत हैं।
पूरे मामले में अपीलकर्ता ने विभाग पर गंभीर सवाल उठाते हुए कहा है कि उनके किसी भी पत्र पर वास्तविक कार्यवाही नहीं की गई, और यदि की गई होती तो उसका रिकॉर्ड उपलब्ध कराया जाना चाहिए था। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि विभाग में बिना आवेदन और बिना निर्धारित प्रक्रिया के विज्ञापन दिए जाते हैं, जबकि उनके वैध पत्रों पर कार्यवाही से बचा गया।
द्वितीय अपील में अपीलकर्ता ने सूचना अधिकार अधिनियम की कई धाराओं—2(एफ), 2(जे), 4(1)(सी), 5(4), 7(1), 7(6) और 19(1)—के उल्लंघन का आरोप लगाया है। साथ ही उन्होंने आयोग से मांग की है कि उन्हें सभी संबंधित दस्तावेजों की प्रमाणित प्रतियां, फाइल नोटिंग, कार्यवाही विवरण और रजिस्टर/डायरी नंबर उपलब्ध कराए जाएं।
इसके अलावा अपीलकर्ता ने संबंधित लोक सूचना अधिकारी और अन्य अधिकारियों पर दंडात्मक कार्रवाई की मांग की है। उन्होंने यह भी अनुरोध किया है कि उन्हें हुए मानसिक, आर्थिक और प्रशासनिक कष्ट के लिए उचित मुआवजा प्रदान किया जाए।
मामला अब सूचना आयोग के समक्ष विचाराधीन है, जहां यह तय किया जाएगा कि क्या वास्तव में विभाग द्वारा सूचना अधिकार अधिनियम के प्रावधानों का उल्लंघन किया गया है और यदि हां, तो जिम्मेदार अधिकारियों पर क्या कार्रवाई की जानी चाहिए।






