

(सलीम रज़ा पत्रकार )
देहरादून: उत्तराखण्ड की पवित्र धरती हमेशा से वीरों, संतों, समाजसेवियों और कर्मयोगियों की भूमि रही है। यहां की कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में रहने वाले लोग संघर्ष करना बचपन से ही सीख जाते हैं। यही संघर्ष उन्हें मजबूत बनाता है और देश-दुनिया में अलग पहचान दिलाता है। ऐसे ही व्यक्तित्वों में एक नाम है भगत सिंह कोश्यारी का, जिन्हें देश के प्रतिष्ठित नागरिक सम्मान पद्म भूषण से सम्मानित किया जा रहा है। यह सम्मान केवल उनके व्यक्तिगत जीवन की उपलब्धि नहीं है, बल्कि पूरे उत्तराखण्ड की जनता के लिए गर्व और सम्मान का विषय है। पहाड़ के एक साधारण गांव से निकलकर देश के बड़े संवैधानिक पदों तक पहुंचने और फिर पद्म भूषण जैसे सम्मान से नवाजे जाने तक का उनका सफर हर व्यक्ति के लिए प्रेरणा देता है।
भगत सिंह कोश्यारी का जीवन संघर्ष, सादगी और सेवा का उदाहरण रहा है। उन्होंने कभी भी राजनीति को केवल सत्ता प्राप्त करने का माध्यम नहीं माना, बल्कि जनसेवा का रास्ता समझा। पहाड़ की कठिन परिस्थितियों में पले-बढ़े कोश्यारी ने बचपन से ही अभावों को करीब से देखा। गांवों में शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क और रोजगार जैसी समस्याएं किस तरह लोगों के जीवन को प्रभावित करती हैं, इसका अनुभव उन्होंने स्वयं किया। शायद यही कारण था कि आगे चलकर उनका पूरा जीवन समाज और राज्य के विकास के लिए समर्पित हो गया।
उत्तराखण्ड के पहाड़ी क्षेत्रों में जीवन आसान नहीं होता। वहां रहने वाला व्यक्ति हर दिन संघर्ष करता है। कभी शिक्षा के लिए दूर-दूर तक पैदल चलना पड़ता है तो कभी इलाज के लिए कई किलोमीटर की यात्रा करनी पड़ती है। ऐसे माहौल में बड़ा होने वाला व्यक्ति जीवन की असली चुनौतियों को बहुत करीब से समझता है। भगत सिंह कोश्यारी भी इन्हीं परिस्थितियों से निकलकर आगे बढ़े। उन्होंने कठिनाइयों को कमजोरी नहीं बनने दिया, बल्कि उन्हें अपनी ताकत बना लिया। यही कारण है कि आज उनका जीवन लाखों युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत बन चुका है।
राजनीति में आने से पहले भी उनका झुकाव सामाजिक कार्यों की ओर था। वे शिक्षा और समाज जागरण से जुड़े रहे। उनका मानना था कि किसी भी समाज का विकास शिक्षा से ही संभव है। उन्होंने युवाओं को जागरूक करने और समाज में सकारात्मक सोच पैदा करने का काम किया। उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि वे हमेशा जमीन से जुड़े रहे। बड़े पदों पर पहुंचने के बाद भी उनके व्यवहार में कभी अहंकार नहीं आया। साधारण जीवनशैली और सरल स्वभाव ने उन्हें आम जनता के बीच बेहद लोकप्रिय बनाया।
उत्तराखण्ड राज्य आंदोलन के समय भी उनकी भूमिका महत्वपूर्ण रही। अलग राज्य की मांग केवल राजनीतिक लड़ाई नहीं थी, बल्कि पहाड़ के लोगों के अधिकारों और विकास की लड़ाई थी। उस दौर में हजारों लोगों ने संघर्ष किया, आंदोलन किए और बलिदान दिए। भगत सिंह कोश्यारी उन नेताओं में रहे जिन्होंने आंदोलन की भावना को मजबूती देने का कार्य किया। उन्होंने हमेशा पहाड़ की समस्याओं को मजबूती से उठाया और अलग राज्य की जरूरत को देश के सामने रखा। उत्तराखण्ड बनने के बाद लोगों को उम्मीद थी कि अब उनके क्षेत्र का विकास तेजी से होगा और कोश्यारी जैसे नेताओं ने इस दिशा में लगातार प्रयास भी किए।
मुख्यमंत्री के रूप में उनका कार्यकाल भले लंबा न रहा हो, लेकिन उन्होंने राज्यहित को प्राथमिकता देने का प्रयास किया। उन्होंने हमेशा गांवों के विकास, शिक्षा और युवाओं के भविष्य की बात की। पहाड़ से लगातार हो रहे पलायन को रोकना उस समय भी बड़ी चुनौती थी और आज भी है। कोश्यारी ने इस समस्या को गंभीरता से समझा। उनका मानना था कि जब तक गांवों में रोजगार और बुनियादी सुविधाएं नहीं पहुंचेंगी, तब तक पलायन रुकना मुश्किल है। उन्होंने राज्य के विकास को केवल शहरों तक सीमित रखने के बजाय गांवों तक पहुंचाने की सोच रखी।
राजनीति में आज जिस तरह आरोप-प्रत्यारोप और कटुता देखने को मिलती है, उसके बीच भगत सिंह कोश्यारी का व्यक्तित्व अलग दिखाई देता है। वे अपने सरल स्वभाव और सहज व्यवहार के लिए जाने जाते रहे हैं। विरोधी दलों के नेताओं के साथ भी उनके संबंध सामान्य और सम्मानजनक रहे। यही लोकतंत्र की खूबसूरती भी है कि विचार अलग हो सकते हैं, लेकिन सम्मान बना रहना चाहिए। कोश्यारी ने अपने सार्वजनिक जीवन में इसी परंपरा को निभाने का प्रयास किया।
जब उन्हें महाराष्ट्र का राज्यपाल बनाया गया तो यह उत्तराखण्ड के लिए भी गौरव का क्षण था। देश के एक बड़े और महत्वपूर्ण राज्य की संवैधानिक जिम्मेदारी संभालना आसान कार्य नहीं होता। राज्यपाल का पद केवल औपचारिक नहीं होता, बल्कि उसमें संविधान की मर्यादा और लोकतांत्रिक व्यवस्था की जिम्मेदारी भी जुड़ी होती है। भगत सिंह कोश्यारी ने इस जिम्मेदारी को अपने अनुभव और संतुलित दृष्टिकोण के साथ निभाने का प्रयास किया। महाराष्ट्र में रहते हुए भी वे अपनी सरलता और सहजता के कारण चर्चा में रहे।
आज जब उन्हें पद्म भूषण सम्मान मिलने जा रहा है, तब यह सम्मान उत्तराखण्ड के हर व्यक्ति को अपनेपन का एहसास करा रहा है। पहाड़ के लोग इसे अपनी उपलब्धि मान रहे हैं। किसी राज्य का सम्मान तब और बढ़ जाता है जब वहां से निकला कोई व्यक्ति राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाता है। यह सम्मान उत्तराखण्ड के युवाओं के लिए भी संदेश है कि सीमित संसाधन कभी भी सफलता की राह में बाधा नहीं बन सकते। यदि इरादे मजबूत हों और मेहनत ईमानदारी से की जाए तो कोई भी व्यक्ति ऊंचाइयों तक पहुंच सकता है।
पद्म भूषण सम्मान केवल पुरस्कार नहीं होता, बल्कि यह देश की ओर से उस व्यक्ति के योगदान को स्वीकार करने का प्रतीक होता है। यह सम्मान उन लोगों को मिलता है जिन्होंने अपने क्षेत्र में लंबे समय तक समाज और राष्ट्र के लिए महत्वपूर्ण कार्य किए हों। भगत सिंह कोश्यारी को यह सम्मान मिलना इस बात का प्रमाण है कि उनका सार्वजनिक जीवन सेवा और समर्पण से भरा रहा है। उन्होंने राजनीति को समाज के विकास का माध्यम बनाया और हमेशा जनहित को प्राथमिकता दी।
उत्तराखण्ड के लोगों का अपने नेताओं और समाजसेवियों से भावनात्मक जुड़ाव बहुत गहरा होता है। यहां लोग सादगी और ईमानदारी को सबसे अधिक महत्व देते हैं। शायद यही कारण है कि भगत सिंह कोश्यारी को आज भी लोग अपने बीच का व्यक्ति मानते हैं। वे केवल राजनीतिक नेता नहीं, बल्कि पहाड़ की संघर्षशील भावना के प्रतीक बन चुके हैं। उनका जीवन यह सिखाता है कि व्यक्ति कितना भी बड़ा पद हासिल कर ले, उसे अपनी जड़ों और संस्कारों को कभी नहीं भूलना चाहिए।
आज के समय में जब युवा तेजी से सफलता पाना चाहते हैं, तब भगत सिंह कोश्यारी का जीवन धैर्य और संघर्ष का संदेश देता है। उन्होंने धीरे-धीरे मेहनत के बल पर अपनी पहचान बनाई। उनके जीवन में उतार-चढ़ाव भी आए, चुनौतियां भी आईं, लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी। यही संघर्ष उन्हें खास बनाता है। उनका जीवन यह बताता है कि सफलता केवल बड़े शहरों या अमीर परिवारों की मोहताज नहीं होती। गांवों और पहाड़ों से निकलने वाले लोग भी अपनी मेहनत और लगन से देश का नाम रोशन कर सकते हैं।
उत्तराखण्ड की पहचान केवल प्राकृतिक सुंदरता से नहीं है, बल्कि यहां के लोगों की मेहनत, ईमानदारी और देशभक्ति से भी है। सेना से लेकर शिक्षा, राजनीति, साहित्य और प्रशासन तक उत्तराखण्ड के लोगों ने देश को अपनी सेवाएं दी हैं। भगत सिंह कोश्यारी को मिला यह सम्मान उसी गौरवशाली परंपरा की एक और मजबूत कड़ी है। यह सम्मान आने वाली पीढ़ियों को भी प्रेरित करेगा कि वे अपने राज्य, समाज और देश के लिए सकारात्मक योगदान दें।
आज पूरा उत्तराखण्ड इस सम्मान से गौरवान्वित है। गांवों से लेकर शहरों तक लोग इसे अपनी खुशी मान रहे हैं। यह सम्मान केवल एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि उस पहाड़ी संस्कृति का सम्मान है जिसने हमेशा संघर्ष में भी उम्मीद को जिंदा रखा। भगत सिंह कोश्यारी का जीवन और उन्हें मिला पद्म भूषण सम्मान आने वाले समय में भी उत्तराखण्ड के लोगों को प्रेरणा देता रहेगा। देवभूमि का यह सपूत आने वाली पीढ़ियों के लिए मेहनत, सादगी और राष्ट्रसेवा का एक जीवंत उदाहरण बन चुका है।







