
सैदपुर / बदायूं: कुर्बानी सिर्फ एक रस्म या जानवर ज़बह करने का नाम नहीं है, बल्कि यह अल्लाह तआला की मोहब्बत, बंदगी, इताअत और अपने जज़्बात को उसके हुक्म के आगे झुका देने का सबसे बड़ा पैगाम है। इस्लाम में कुर्बानी की असल रूह इंसान के दिल में तक़वा, एहसास-ए-बंदगी और अल्लाह के लिए हर चीज़ कुर्बान कर देने का जज़्बा पैदा करना है। यही वजह है कि हर साल ईद-उल-अज़हा के मौके पर दुनिया भर के मुसलमान इस सुन्नत-ए-इब्राहीमी को अदा करते हैं और अल्लाह की बारगाह में अपनी मोहब्बत और फरमांबरदारी का इज़हार करते हैं।
कुर्बानी हमें हज़रत इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) और उनके फरमांबरदार बेटे हज़रत इस्माईल (अलैहिस्सलाम) की वह अज़ीम और तारीखी कुर्बानी याद दिलाती है, जब एक बाप ने अल्लाह के हुक्म पर अपनी सबसे प्यारी चीज़ यानी अपने बेटे तक को कुर्बान करने का इरादा कर लिया था। यह इंसानी तारीख का सबसे बड़ा इम्तिहान था। जब हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम अपने बेटे को अल्लाह की राह में कुर्बान करने जा रहे थे, तब दोनों बाप-बेटे ने सब्र, यकीन और इताअत की ऐसी मिसाल पेश की, जिसे क़यामत तक याद रखा जाएगा। अल्लाह तआला ने उनकी नीयत और सच्चाई को इतना पसंद फरमाया कि बेटे की जगह जन्नत से दुम्बा भेज दिया और इस अमल को पूरी उम्मत के लिए एक अज़ीम इबादत बना दिया।
हमारे प्यारे नबी हज़रत मोहम्मद ﷺ ने भी हर साल कुर्बानी की और अपनी उम्मत को इसकी ताकीद फरमाई। हदीस शरीफ में आता है कि “जिस शख्स में कुर्बानी की हैसियत हो और फिर भी वह कुर्बानी न करे, वह हमारी ईदगाह के करीब भी न आए।” हनफ़ी उलमा के नज़दीक यह हदीस इस बात की मजबूत दलील है कि साहिब-ए-निसाब मुसलमान पर कुर्बानी वाजिब है। यही वजह है कि दीन-ए-इस्लाम में कुर्बानी को बहुत अहम इबादत माना गया है।
दीनी जानकारों के मुताबिक हर उस मुसलमान मर्द या औरत पर कुर्बानी वाजिब होती है जो बालिग़ हो, समझदार हो, मुसाफिर न हो और जिसके पास जरूरत से ज्यादा इतना माल या दौलत मौजूद हो जो ज़कात के निसाब तक पहुंचती हो। आज के दौर में अगर किसी इंसान के पास नकद पैसा, सोना-चांदी, कारोबार का माल, बचत या अतिरिक्त सामान इतना हो कि निसाब पूरा हो जाए तो उस पर कुर्बानी वाजिब हो जाती है। ऐसे में अगर कोई सिर्फ लापरवाही, दुनियादारी या कंजूसी की वजह से कुर्बानी छोड़ देता है, तो यह दीन की नजर में अच्छी बात नहीं मानी जाती।
हाजी मो. स्वाले अली हज सेवक एवं पूर्व शिक्षक सैदपुर ने कहा कि आज का इंसान दुनिया की चकाचौंध और दिखावे में लाखों रुपये खर्च कर देता है। शादी-ब्याह में फिजूलखर्ची, महंगे मोबाइल, कपड़े, होटल और घूमने-फिरने पर खुलकर पैसा बहाया जाता है, लेकिन जब अल्लाह की राह में कुर्बानी का वक्त आता है तो कुछ लोग बहाने बनाने लगते हैं। जबकि कुरआन शरीफ साफ तौर पर बताता है कि अल्लाह तक न जानवर का गोश्त पहुंचता है और न उसका खून, बल्कि अल्लाह तक इंसान का तक़वा और उसकी नीयत पहुंचती है। सूरह अल-हज्ज आयत 37 में अल्लाह तआला फरमाता है, “अल्लाह तक न उनका गोश्त पहुंचता है और न उनका खून, बल्कि उस तक तुम्हारा तक़वा पहुंचता है।”
उन्होंने कहा कि कुर्बानी का असली मकसद गरीबों, जरूरतमंदों और रिश्तेदारों का भी ख्याल रखना है। ईद-उल-अज़हा हमें समाज में भाईचारा, हमदर्दी और इंसानियत का पैगाम देती है। कुर्बानी का गोश्त गरीबों में तकसीम करना, भूखे लोगों तक खुशियां पहुंचाना और अल्लाह की नेमतों पर उसका शुक्र अदा करना भी इस इबादत का अहम हिस्सा है।
हाजी मो. स्वाले अली ने यह भी कहा कि दीन की बात समझाना और किसी को बेइज्जत करना दोनों अलग चीजें हैं। अगर किसी इंसान की आर्थिक मजबूरी हो, वह कर्ज में डूबा हो, बीमार हो या वास्तव में उसके पास हैसियत न हो तो इस्लाम उस पर कोई बोझ नहीं डालता। अल्लाह तआला किसी इंसान को उसकी ताकत से ज्यादा जिम्मेदारी नहीं देता। लेकिन जिन लोगों को अल्लाह ने माल-दौलत, आराम और हर तरह की सुविधा दी हो, उन्हें अल्लाह के हुक्मों को हल्के में नहीं लेना चाहिए।
उन्होंने लोगों से अपील करते हुए कहा कि नसीहत हमेशा नरमी, मोहब्बत और हिकमत के साथ करनी चाहिए। किसी को ताना देना, मजाक उड़ाना या लोगों के सामने शर्मिंदा करना इस्लामी तरीका नहीं है। दीन का मकसद इंसानों को जोड़ना और उन्हें अल्लाह की राह की तरफ बुलाना है, न कि किसी को छोटा साबित करना।
अंत में उन्होंने दुआ की कि अल्लाह तआला हम सभी को सही समझ, सच्ची नीयत और अपने हुक्मों पर अमल करने की तौफीक अता फरमाए। हमारे दिलों में दिखावे की जगह तक़वा और खालिस मोहब्बत पैदा करे तथा हमारी कुर्बानी और तमाम इबादतों को अपनी बारगाह में कबूल फरमाए। आमीन।
रिपोर्ट : ज़ीशान सिद्दीकी, सैदपुर





