

(सलीम रज़ा, पत्रकार,लेखक )
हरेला केवल एक पर्व नहीं है, बल्कि उत्तराखण्ड की प्रकृति, संस्कृति और जीवन का प्रतीक है। हर साल सरकार और प्रशासन बड़े उत्साह के साथ लोगों से पेड़ लगाने की अपील करते हैं। “एक पेड़ मां के नाम” जैसी मुहिम चलाई जाती है, मंत्री और अधिकारी कैमरों के सामने पौधे लगाते हैं, सोशल मीडिया पर तस्वीरें साझा होती हैं और पर्यावरण बचाने के लंबे-लंबे भाषण दिए जाते हैं। लेकिन सवाल यह है कि जब दूसरी तरफ सड़क चौड़ीकरण, विकास परियोजनाओं और निर्माण कार्यों के नाम पर हजारों हरे-भरे पेड़ बेरहमी से काटे जा रहे हैं, तब इन अभियानों का क्या अर्थ रह जाता है?
एक तरफ जनता से कहा जाता है कि हर व्यक्ति एक पौधा लगाए, दूसरी तरफ वर्षों पुराने पेड़ों को कुछ ही घंटों में मशीनों से गिरा दिया जाता है। जिस पेड़ को बड़ा होने में 30 से 50 साल लगते हैं, उसकी भरपाई एक छोटे से पौधे से कैसे हो सकती है? पौधा लगाना अच्छी बात है, लेकिन उससे भी बड़ी जिम्मेदारी पहले से मौजूद पेड़ों को बचाना है। यदि पुराने जंगल और हरे-भरे पेड़ ही नहीं बचेंगे, तो केवल पौधारोपण के कार्यक्रम पर्यावरण की रक्षा नहीं कर सकते।
सरकार विकास का तर्क देती है। सड़कें चौड़ी होंगी तो सुविधाएं बढ़ेंगी, पर्यटन बढ़ेगा और रोजगार मिलेगा। इसमें कोई दो राय नहीं कि विकास जरूरी है, लेकिन विकास का मतलब प्रकृति का विनाश नहीं होना चाहिए। आज दुनिया भर में ऐसी तकनीक और योजनाएं अपनाई जा रही हैं जिनसे सड़कें भी बनती हैं और पेड़ों को भी कम से कम नुकसान होता है। लेकिन यहां अक्सर सबसे आसान रास्ता यही चुना जाता है कि पेड़ काट दो और बाद में कुछ पौधे लगाकर जिम्मेदारी पूरी मान लो।
विडंबना यह है कि हर साल करोड़ों रुपये पौधारोपण पर खर्च होते हैं, लेकिन इन पौधों की देखभाल कौन करता है, इसका जवाब किसी के पास नहीं होता। बड़ी संख्या में लगाए गए पौधे कुछ महीनों में ही सूख जाते हैं। दूसरी ओर जो पुराने पेड़ वर्षों से लोगों को ऑक्सीजन, छाया, फल और स्वच्छ वातावरण दे रहे थे, वे हमेशा के लिए खत्म हो जाते हैं। ऐसे में पर्यावरण संरक्षण के दावे खोखले नजर आते हैं।
हरेला हमें प्रकृति के साथ संतुलन में जीना सिखाता है। यह पर्व केवल पौधा लगाने का नहीं, बल्कि पेड़ों को परिवार के सदस्य की तरह बचाने का संदेश देता है। यदि सरकार वास्तव में हरेला की भावना का सम्मान करना चाहती है, तो उसे केवल फोटो खिंचवाने वाले कार्यक्रमों से आगे बढ़ना होगा। सड़क निर्माण की ऐसी योजनाएं बनानी होंगी जिनमें पेड़ों की कटाई न्यूनतम हो, जहां कटाई अनिवार्य हो वहां वैज्ञानिक तरीके से उसका विकल्प तैयार किया जाए और लगाए गए पौधों के जीवित रहने की पूरी जिम्मेदारी तय हो।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या पर्यावरण संरक्षण केवल एक दिन का उत्सव है या साल भर की जिम्मेदारी? अगर एक ओर हरेला मनाया जाए और दूसरी ओर उसी समय जंगल उजाड़े जाएं, तो यह जनता के साथ भी छल है और प्रकृति के साथ भी। पेड़ केवल लकड़ी नहीं हैं, वे जीवन हैं। उन्हें बचाने की नीयत के बिना पौधारोपण के अभियान केवल दिखावा बनकर रह जाएंगे।
अब समय आ गया है कि सरकारें केवल नारों और अभियानों से आगे बढ़ें। जनता को भी यह समझना होगा कि विकास और पर्यावरण एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक होने चाहिए। जिस दिन विकास की योजनाओं में पेड़ों की रक्षा पहली प्राथमिकता बन जाएगी, उसी दिन हरेला का वास्तविक संदेश भी सार्थक होगा। वरना हर साल पौधे लगाने के समारोह होते रहेंगे और दूसरी ओर कुल्हाड़ियों और मशीनों की आवाज में उत्तराखण्ड की हरियाली धीरे-धीरे समाप्त होती रहेगी।







