

(सलीम रज़ा, पत्रकार)
सर्वप्रथम आप सभी को राष्ट्रीय बालिका दिवस की हार्दिक शुभकामनाऐं ।आज के दौर में जब दुनिया तकनीक, विज्ञान और विकास की नई ऊँचाइयों की बात कर रही है, उसी दौर में बालिकाओं की स्थिति एक गहरी सामाजिक विडंबना को उजागर करती है। बालिका दिवस हमें केवल उत्सव का अवसर नहीं देता, बल्कि यह आत्ममंथन का दिन भी है—यह सोचने का कि समाज के आधे हिस्से के साथ हम वास्तव में कैसा व्यवहार कर रहे हैं। काग़ज़ों और मंचों पर बालिकाओं के अधिकारों की बातें ज़ोर-शोर से होती हैं, लेकिन ज़मीनी हकीकत अक्सर इन दावों से बहुत अलग दिखाई देती है।
आज भी देश के कई हिस्सों में बालिका का जन्म खुशी नहीं, बल्कि चिंता का कारण बन जाता है। कहीं भ्रूण हत्या, कहीं जन्म के बाद भेदभाव, तो कहीं शिक्षा और पोषण में उपेक्षा—बालिकाएँ हर स्तर पर असमानता का सामना कर रही हैं। आधुनिक समय में भी यह मानसिकता पूरी तरह समाप्त नहीं हो पाई है कि बेटा वंश चलाने वाला होता है और बेटी बोझ। यही सोच बालिकाओं की दुर्दशा की सबसे बड़ी जड़ है।
शिक्षा के क्षेत्र में स्थिति कुछ बेहतर ज़रूर हुई है, लेकिन असमानता अब भी मौजूद है। ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों में आज भी कई बालिकाएँ स्कूल से पहले ही घर के कामों, छोटे भाई-बहनों की देखभाल और कम उम्र में शादी के दायित्वों में झोंक दी जाती हैं। तकनीकी युग में जहाँ ऑनलाइन शिक्षा और डिजिटल स्किल्स की बात हो रही है, वहीं असंख्य बालिकाएँ अब भी किताब और स्कूल की दहलीज से दूर हैं। शिक्षा से वंचित होना उनके पूरे भविष्य को सीमित कर देता है।
स्वास्थ्य और पोषण की स्थिति भी चिंताजनक है। कई परिवारों में बालिकाओं को भोजन, चिकित्सा और देखभाल में प्राथमिकता नहीं मिलती। किशोरावस्था में एनीमिया, कुपोषण और मानसिक तनाव जैसी समस्याएँ आम हैं, लेकिन इन पर गंभीरता से ध्यान नहीं दिया जाता। मासिक धर्म जैसे प्राकृतिक विषय पर आज भी चुप्पी और शर्म का माहौल है, जिससे बालिकाओं को शारीरिक और मानसिक दोनों तरह की पीड़ा सहनी पड़ती है।
सुरक्षा का प्रश्न आज के समय में सबसे बड़ा और सबसे संवेदनशील मुद्दा बन चुका है। स्कूल जाते समय, सार्वजनिक स्थानों पर या यहां तक कि अपने ही घरों में कई बालिकाएँ असुरक्षित महसूस करती हैं। यौन हिंसा, छेड़छाड़ और साइबर उत्पीड़न जैसी घटनाएँ यह साबित करती हैं कि आधुनिकता के बावजूद समाज की सोच में अपेक्षित बदलाव नहीं आया है। डर के इस माहौल में पलती बालिकाएँ आत्मविश्वास और स्वतंत्रता दोनों खो देती हैं।
बाल श्रम और बाल विवाह जैसी कुरीतियाँ भी आज के दौर में पूरी तरह समाप्त नहीं हुई हैं। आर्थिक मजबूरी और सामाजिक दबाव के चलते कई बालिकाओं को बचपन में ही जिम्मेदारियों के बोझ तले दबा दिया जाता है। बचपन, जो सपनों और सीखने का समय होना चाहिए, उनके लिए संघर्ष और समझौते का दौर बन जाता है।
इसके बावजूद, यह भी सच है कि हर कठिन परिस्थिति के बीच बालिकाएँ अद्भुत साहस और क्षमता का परिचय दे रही हैं। खेल, विज्ञान, कला, शिक्षा और सामाजिक नेतृत्व के क्षेत्र में वे नए कीर्तिमान स्थापित कर रही हैं। यह हमें बताता है कि समस्या क्षमता की नहीं, अवसरों और सोच की है। जब समाज और परिवार समर्थन देते हैं, तो बालिकाएँ न केवल अपना भविष्य संवारती हैं, बल्कि पूरे समाज को आगे बढ़ाती हैं।
बालिका दिवस का वास्तविक अर्थ तभी साकार होगा जब यह केवल एक प्रतीकात्मक दिन न रहकर सतत प्रयास का संकल्प बने। ज़रूरत है कि परिवारों में समानता की भावना को मजबूत किया जाए, स्कूलों और समुदायों में संवेदनशीलता लाई जाए और कानूनों को सख्ती से लागू किया जाए। सबसे अहम बात यह है कि बालिकाओं को दया या सहानुभूति की नहीं, सम्मान, सुरक्षा और समान अवसरों की आवश्यकता है।
आज के दौर में बालिकाओं की दुर्दशा पर बात करना इसलिए ज़रूरी है ताकि हम अपने समाज का सच देख सकें। बालिकाएँ केवल भविष्य की नागरिक नहीं हैं, वे वर्तमान की ताकत हैं। जब तक उनका बचपन सुरक्षित, शिक्षित और सम्मानजनक नहीं होगा, तब तक किसी भी विकास की कहानी अधूरी ही रहेगी। बालिका दिवस हमें यही याद दिलाता है कि बदलाव की शुरुआत आज, यहीं और अभी से करनी होगी।







