

(सलीम रज़ा,पत्रकार )
गुरु पूर्णिमा भारतीय संस्कृति का एक बहुत ही पवित्र और प्रेरणादायक पर्व है। यह पर्व गुरु के प्रति सम्मान, श्रद्धा और कृतज्ञता व्यक्त करने का दिन है। हमारे जीवन में गुरु का स्थान बहुत ऊँचा माना गया है। गुरु ही वह व्यक्ति होता है जो अज्ञान के अंधकार को दूर करके ज्ञान का प्रकाश फैलाता है। इसलिए भारत में गुरु को भगवान के समान सम्मान दिया जाता है। हर वर्ष आषाढ़ मास की पूर्णिमा के दिन गुरु पूर्णिमा का पर्व पूरे देश में श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है।
गुरु पूर्णिमा का संबंध महर्षि वेदव्यास से भी जुड़ा हुआ है। माना जाता है कि इसी दिन उनका जन्म हुआ था। महर्षि वेदव्यास ने चारों वेदों का विभाजन किया और महाभारत जैसे महान ग्रंथ की रचना की। उन्होंने अनेक पुराणों की भी रचना की, जिसके कारण उन्हें आदि गुरु कहा जाता है। गुरु पूर्णिमा के अवसर पर उनके योगदान को याद किया जाता है और उन्हें श्रद्धापूर्वक नमन किया जाता है।
गुरु का अर्थ केवल विद्यालय में पढ़ाने वाले शिक्षक से नहीं है। माता-पिता हमारे पहले गुरु होते हैं, जो हमें जीवन की पहली शिक्षा देते हैं। इसके बाद शिक्षक हमें पढ़ाई के साथ-साथ अच्छे संस्कार, अनुशासन और सही जीवन जीने का मार्ग सिखाते हैं। जीवन में जो भी व्यक्ति हमें सही दिशा दिखाता है, नई सीख देता है और हमारी गलतियों को सुधारने में मदद करता है, वह किसी न किसी रूप में हमारा गुरु होता है।
गुरु हमें केवल किताबों का ज्ञान नहीं देते, बल्कि अच्छे और बुरे में अंतर करना भी सिखाते हैं। वे हमें सच्चाई, ईमानदारी, मेहनत, धैर्य और विनम्रता का महत्व समझाते हैं। जब जीवन में कठिनाइयाँ आती हैं, तब गुरु का मार्गदर्शन हमें सही निर्णय लेने की शक्ति देता है। उनके अनुभव और शिक्षा से हमारा व्यक्तित्व निखरता है और हम एक अच्छे इंसान बनते हैं।
प्राचीन समय में विद्यार्थी गुरुकुलों में रहकर शिक्षा प्राप्त करते थे। वे अपने गुरु की सेवा करते थे और उनसे जीवन के हर क्षेत्र की शिक्षा प्राप्त करते थे। गुरु और शिष्य के बीच विश्वास, सम्मान और प्रेम का गहरा संबंध होता था। आज समय बदल गया है, लेकिन गुरु का महत्व आज भी उतना ही है। आधुनिक विद्यालयों, महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में भी शिक्षक अपने विद्यार्थियों का भविष्य संवारने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
गुरु पूर्णिमा के दिन विद्यार्थी अपने शिक्षकों का सम्मान करते हैं, उनका आशीर्वाद लेते हैं और उनके प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करते हैं। कई स्थानों पर विशेष कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। विद्यालयों और शिक्षण संस्थानों में सांस्कृतिक कार्यक्रम, भाषण, कविता पाठ और सम्मान समारोह आयोजित होते हैं। आश्रमों और मंदिरों में धार्मिक कार्यक्रम, भजन, सत्संग और प्रवचन का आयोजन किया जाता है। लोग अपने गुरुओं का सम्मान करते हुए उन्हें पुष्प अर्पित करते हैं और उनका आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।
आज के समय में जब जीवन बहुत व्यस्त हो गया है, तब भी गुरु का महत्व कम नहीं हुआ है। नई तकनीकों और बदलते समय के साथ शिक्षा के तरीके बदल गए हैं, लेकिन सही मार्गदर्शन की आवश्यकता हमेशा बनी रहती है। एक अच्छा गुरु अपने ज्ञान, अनुभव और प्रेरणा से विद्यार्थियों को सफल और जिम्मेदार नागरिक बनने के लिए प्रेरित करता है। गुरु हमें केवल परीक्षा में अच्छे अंक लाने की नहीं, बल्कि जीवन में सफल और श्रेष्ठ बनने की शिक्षा देते हैं।
गुरु पूर्णिमा हमें यह भी सिखाती है कि हमें अपने जीवन में मिले हर गुरु का सम्मान करना चाहिए। हमें उनकी सीख को अपने जीवन में अपनाना चाहिए और हमेशा उनका आभार व्यक्त करना चाहिए। जो व्यक्ति अपने गुरु का सम्मान करता है, वह जीवन में आगे बढ़ता है और समाज में सम्मान प्राप्त करता है। गुरु का आशीर्वाद मनुष्य के जीवन की सबसे बड़ी पूंजी माना जाता है।
यह पर्व केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं है, बल्कि भारतीय संस्कृति की महान विरासत का प्रतीक भी है। यह हमें ज्ञान, संस्कार, विनम्रता और कृतज्ञता का महत्व समझाता है। गुरु के बिना ज्ञान अधूरा है और ज्ञान के बिना जीवन की सही दिशा मिलना कठिन है। इसलिए गुरु पूर्णिमा का संदेश है कि हम अपने गुरुओं का सम्मान करें, उनके बताए मार्ग पर चलें और अपने जीवन को ज्ञान, सदाचार और सेवा के माध्यम से सफल और सार्थक बनाएँ।







