

(सलीम रज़ा, पत्रकार )
छात्रों पर बरसी लाठियां, सड़कों पर गूंजते इस्तीफे के नारे और अंततः आंदोलन का शांत हो जाना—क्या इससे यह मान लिया जाए कि देश की परीक्षा प्रणाली अब सुरक्षित हो गई है? क्या करोड़ों युवाओं को यह भरोसा मिल गया है कि अगली भर्ती परीक्षा या प्रवेश परीक्षा का प्रश्नपत्र अब किसी तिजोरी से नहीं, बल्कि सीधे परीक्षा केंद्र तक पहुंचेगा? यदि इन प्रश्नों का उत्तर “नहीं” है, तो स्पष्ट है कि आंदोलन भले समाप्त हो गया हो, लेकिन उसका मूल कारण आज भी जीवित है।
भारत का संविधान प्रत्येक नागरिक को समान अवसर का अधिकार देता है। अनुच्छेद 14 समानता की गारंटी देता है और अनुच्छेद 16 सार्वजनिक रोजगार में समान अवसर सुनिश्चित करता है। प्रतियोगी परीक्षाएं इन्हीं संवैधानिक मूल्यों को व्यवहार में लागू करने का सबसे महत्वपूर्ण माध्यम हैं। लेकिन जब प्रश्नपत्र परीक्षा से पहले ही बाजार में बिकने लगें, जब मेहनत की जगह पैसों और नेटवर्क की ताकत चयन तय करने लगे, तब केवल एक परीक्षा नहीं टूटती, बल्कि संविधान द्वारा स्थापित समान अवसर की पूरी अवधारणा कमजोर पड़ जाती है।
इसी संवैधानिक संकट की पृष्ठभूमि में छात्रों का आंदोलन खड़ा हुआ। वर्षों की तैयारी, आर्थिक कठिनाइयों और मानसिक दबाव के बाद यदि कोई परीक्षा पेपर लीक की भेंट चढ़ जाए, तो आक्रोश केवल भावनात्मक प्रतिक्रिया नहीं बल्कि लोकतांत्रिक असंतोष का स्वाभाविक परिणाम है। लोकतंत्र की शक्ति ही यही है कि नागरिक सरकार से जवाब मांग सकें। लेकिन जब इस जवाब की मांग का उत्तर संवाद के बजाय पुलिस की लाठियां बन जाएं, तब सरकार को यह आत्ममंथन करना चाहिए कि कहीं वह समस्या का समाधान खोजने के बजाय असहमति को नियंत्रित करने का प्रयास तो नहीं कर रही।
यह भी उतना ही सत्य है कि कानून-व्यवस्था बनाए रखना सरकार का दायित्व है। यदि कोई प्रदर्शन हिंसक हो जाए या सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचने लगे तो प्रशासन हस्तक्षेप कर सकता है। किंतु लोकतांत्रिक शासन में बल प्रयोग अंतिम विकल्प होना चाहिए, पहला नहीं। छात्र किसी विदेशी शक्ति के प्रतिनिधि नहीं होते; वे उसी राष्ट्र की युवा शक्ति हैं, जिसके भविष्य का निर्माण शिक्षा व्यवस्था करती है। उनके साथ संवाद लोकतंत्र की मजबूती है, टकराव उसकी कमजोरी।
इसी क्रम में शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग सामने आई। संसदीय लोकतंत्र में मंत्री केवल विभाग के प्रमुख नहीं होते, बल्कि उसकी राजनीतिक और नैतिक जवाबदेही भी उन्हीं पर होती है। इसलिए यदि लगातार परीक्षाओं में अनियमितताएं सामने आती हैं, तो विपक्ष का इस्तीफे की मांग करना लोकतांत्रिक राजनीति का स्वाभाविक हिस्सा है। दूसरी ओर सरकार यह कह सकती है कि दोषियों पर कार्रवाई की जा रही है, गिरफ्तारियां हो रही हैं और कानून अपना काम कर रहा है। लेकिन राजनीति में केवल कानूनी जिम्मेदारी पर्याप्त नहीं होती; नैतिक उत्तरदायित्व भी उतना ही महत्वपूर्ण माना जाता है। यही कारण है कि इस्तीफा केवल एक व्यक्ति का प्रश्न नहीं बल्कि जवाबदेही की संस्कृति का प्रश्न बन जाता है।
फिर भी सबसे बड़ा भ्रम यही पैदा किया जा रहा है कि आंदोलन समाप्त हो गया, इसलिए समस्या भी समाप्त हो गई। लोकतंत्र में किसी आंदोलन का अंत समाधान का प्रमाण नहीं होता। कई आंदोलन आश्वासनों पर समाप्त होते हैं, कई न्यायिक प्रक्रिया की प्रतीक्षा में और कई संगठनात्मक रणनीति के कारण। किंतु यदि मूल कारण जस का तस बना रहे, तो आंदोलन की समाप्ति केवल एक विराम होती है, पूर्ण विराम नहीं।
असल प्रश्न यह है कि क्या अब पेपर लीक नहीं होंगे? इसका ईमानदार उत्तर किसी सरकार के पास नहीं है। कोई भी सरकार, कोई भी मंत्री और कोई भी एजेंसी यह शत-प्रतिशत गारंटी नहीं दे सकती कि भविष्य में कभी प्रश्नपत्र लीक नहीं होगा। ऐसा इसलिए क्योंकि परीक्षा प्रणाली अनेक स्तरों से होकर गुजरती है—प्रश्नपत्र निर्माण, डिजिटल सुरक्षा, मुद्रण, परिवहन, गोपनीय भंडारण, परीक्षा केंद्र और मानवीय हस्तक्षेप। जब तक इन सभी कड़ियों को अभेद्य नहीं बनाया जाता, तब तक जोखिम बना रहेगा।
यही कारण है कि केवल कानून बना देना पर्याप्त नहीं है। सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) अधिनियम, 2024 जैसे कठोर कानून स्वागत योग्य हैं, लेकिन कानून का मूल्य उसकी पुस्तक में नहीं बल्कि उसके प्रभावी क्रियान्वयन में होता है। यदि पेपर लीक के सरगना वर्षों तक मुकदमों में बचते रहें, यदि जांच एजेंसियां केवल छोटे खिलाड़ियों तक सीमित रहें और यदि संगठित परीक्षा माफिया की आर्थिक संरचना पर प्रहार न हो, तो कठोर दंड का प्रावधान भी भय पैदा नहीं कर सकेगा।
पेपर लीक अब व्यक्तिगत अपराध नहीं, बल्कि संगठित आर्थिक अपराध का रूप ले चुका है। इसमें तकनीकी विशेषज्ञ, बिचौलिए, भ्रष्ट कर्मचारी और संगठित गिरोह शामिल होते हैं। इसलिए इसका समाधान केवल पुलिस कार्रवाई नहीं, बल्कि साइबर सुरक्षा, डिजिटल एन्क्रिप्शन, संस्थागत पारदर्शिता और समयबद्ध न्यायिक प्रक्रिया का संयुक्त मॉडल है।
यह भी विचारणीय है कि देश में पेपर लीक की घटनाएं किसी एक राजनीतिक दल के शासन तक सीमित नहीं रही हैं। विभिन्न राज्यों में अलग-अलग दलों की सरकारों के दौरान ऐसी घटनाएं सामने आती रही हैं। इसलिए इसे केवल सत्ता और विपक्ष के राजनीतिक हथियार में बदल देना समस्या के वास्तविक समाधान को और कठिन बना देता है। युवाओं को राजनीतिक बयान नहीं, विश्वसनीय परीक्षा प्रणाली चाहिए।
लोकतंत्र की एक और विडंबना यह है कि चुनावों में युवाओं को सबसे बड़ी शक्ति बताया जाता है, लेकिन जब वही युवा रोजगार, भर्ती और परीक्षा की पारदर्शिता पर प्रश्न उठाते हैं, तो उन्हें अक्सर व्यवस्था के लिए चुनौती की तरह देखा जाता है। यदि सरकारें युवाओं के विश्वास को खो दें, तो यह केवल राजनीतिक संकट नहीं बल्कि सामाजिक पूंजी के क्षरण का संकेत होता है। किसी भी राष्ट्र की सबसे बड़ी संपत्ति उसके प्राकृतिक संसाधन नहीं, बल्कि उसके युवाओं का भरोसा होता है।
सरकार के सामने आज चुनौती केवल पेपर लीक रोकने की नहीं है, बल्कि विश्वास बहाल करने की है। इसके लिए प्रत्येक परीक्षा की स्वतंत्र ऑडिट व्यवस्था, तकनीकी सुरक्षा, दोषियों की त्वरित सजा, परीक्षा एजेंसियों की संस्थागत जवाबदेही और जांच रिपोर्टों की सार्वजनिक पारदर्शिता अनिवार्य होनी चाहिए। यदि एक भी पेपर लीक होता है, तो केवल परीक्षा रद्द करना पर्याप्त नहीं होना चाहिए; यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि जिम्मेदार कौन था और उसे क्या दंड मिला।
विपक्ष की भी जिम्मेदारी कम नहीं है। यदि वह केवल इस्तीफे की मांग तक सीमित रहता है और सत्ता में आने पर वही व्यवस्थागत कमियां बनी रहती हैं, तो उसकी आलोचना नैतिक बल खो देती है। लोकतंत्र में सरकार और विपक्ष दोनों की परीक्षा समान रूप से होती है। एक शासन चलाता है, दूसरा जवाबदेही सुनिश्चित करता है। यदि दोनों अपनी-अपनी भूमिकाओं में विफल हों, तो सबसे बड़ा नुकसान उस युवा को होता है, जिसने वर्षों तक एक निष्पक्ष परीक्षा का सपना देखा था।
अंततः प्रश्न यह नहीं है कि आंदोलन किसने जीता और कौन पीछे हटा। प्रश्न यह है कि क्या देश का विद्यार्थी जीत पाया? क्या उसे यह विश्वास मिला कि उसकी मेहनत किसी माफिया के पैसों से कम नहीं आंकी जाएगी? क्या संविधान द्वारा दिया गया समान अवसर वास्तव में सुरक्षित है? यदि इन प्रश्नों का उत्तर अभी भी स्पष्ट और दृढ़ “हां” में नहीं दिया जा सकता, तो समझ लेना चाहिए कि आंदोलन समाप्त नहीं हुआ है; वह केवल सड़कों से निकलकर करोड़ों युवाओं के मन में चला गया है। और इतिहास गवाह है कि जब किसी लोकतंत्र में नागरिकों का विश्वास कमजोर पड़ता है, तब सबसे पहले उसकी संस्थाओं की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगते हैं। इसलिए सरकार, विपक्ष, न्यायपालिका और परीक्षा एजेंसियों—सभी के सामने यह केवल प्रशासनिक चुनौती नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की साख बचाने की परीक्षा है।







