

( सलीम रज़ा, पत्रकार)
कन्या भ्रूण हत्या हमारे समाज की उन गंभीर बुराइयों में से एक है, जिसके कारण न जाने कितनी बेटियां दुनिया में आने से पहले ही अपना जीवन खो देती हैं। जिस बेटी को जन्म लेने के बाद परिवार की खुशियों का हिस्सा बनना था, वह कई बार गर्भ में ही केवल इसलिए मार दी जाती है क्योंकि वह लड़की है। यह केवल एक अजन्मे बच्चे की हत्या नहीं है, बल्कि यह उस सोच की पहचान है जिसमें बेटे को बेटी से अधिक महत्वपूर्ण समझा जाता है।
बेटी को जन्म देने वाली मां स्वयं एक महिला होती है, फिर भी कई बार परिवार और समाज का दबाव उसे ऐसा फैसला लेने के लिए मजबूर कर देता है, जिसका दर्द जीवन भर उसके मन में रहता है। गर्भ में पल रहे बच्चे का लिंग पता लगाने के बाद यदि केवल लड़की होने के कारण गर्भ को समाप्त कर दिया जाए तो यह मानवता के साथ अन्याय है। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान जीवन बचाने के लिए है, किसी बच्चे को उसके लिंग के आधार पर समाप्त करने के लिए नहीं।
भारत में कन्या भ्रूण हत्या के पीछे सबसे बड़ी वजह बेटे को प्राथमिकता देने वाली मानसिकता है। कुछ परिवार आज भी मानते हैं कि बेटा परिवार का नाम आगे बढ़ाएगा, बुढ़ापे में सहारा बनेगा और संपत्ति का वारिस होगा। दूसरी ओर बेटी को दूसरे घर जाने वाली और आर्थिक बोझ के रूप में देखा जाता है। यह सोच न केवल पुरानी है, बल्कि वास्तविकता से भी दूर है। आज बेटियां शिक्षा, प्रशासन, चिकित्सा, विज्ञान, सेना, खेल, राजनीति, कारोबार और कला सहित हर क्षेत्र में अपनी पहचान बना रही हैं।
दहेज प्रथा भी इस समस्या को बढ़ाने वाली महत्वपूर्ण सामाजिक बुराइयों में शामिल है। बेटी के विवाह और दहेज के खर्च को लेकर कुछ परिवार बेटी को जन्म देने से ही डरने लगते हैं। लेकिन सवाल यह है कि बेटी को दोष क्यों दिया जाए? समस्या बेटी नहीं, बल्कि दहेज की वह कुप्रथा है जिसे समाज ने लंबे समय से सहन किया है। यदि दहेज को सामाजिक रूप से अस्वीकार कर दिया जाए और बेटियों को शिक्षा तथा रोजगार के अवसर दिए जाएं तो बेटी को बोझ मानने वाली सोच कमजोर हो सकती है।
कन्या भ्रूण हत्या की गंभीरता को समझने के लिए जन्म के समय लिंगानुपात के आंकड़ों पर नजर डालना भी जरूरी है। भारत सरकार के NFHS-5, 2019-21 के अनुसार देश में जन्म के समय लिंगानुपात 929 बेटियां प्रति 1,000 बेटों का था। इसका अर्थ यह नहीं है कि हर कम अनुपात वाले राज्य में कन्या भ्रूण हत्या ही कारण है, क्योंकि लिंगानुपात पर सामाजिक, आर्थिक, स्वास्थ्य और जनसांख्यिकीय परिस्थितियों का भी प्रभाव पड़ता है। फिर भी यह आंकड़ा समाज में बेटियों की स्थिति को समझने का एक महत्वपूर्ण संकेत देता है।
NFHS-5 के अनुसार राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की स्थिति में काफी अंतर दिखाई देता है। आंध्र प्रदेश में जन्म के समय लिंगानुपात 934, अरुणाचल प्रदेश में 979 और असम में 964 बेटियां प्रति 1,000 बेटे दर्ज की गईं। बिहार में यह आंकड़ा 908 रहा, जबकि छत्तीसगढ़ में 960 और गुजरात में 955 रहा। हरियाणा में 893 और हिमाचल प्रदेश में 875 बेटियां प्रति 1,000 बेटे दर्ज की गईं।
जम्मू-कश्मीर में यह आंकड़ा 976, झारखंड में 899 और कर्नाटक में 978 रहा। केरल में 951, मध्य प्रदेश में 956 और महाराष्ट्र में 913 बेटियां प्रति 1,000 बेटे दर्ज की गईं। मणिपुर में यह अनुपात 967, मेघालय में 989 और मिजोरम में 969 रहा। नागालैंड में 945 बेटियां प्रति 1,000 बेटे दर्ज की गईं।
दिल्ली में जन्म के समय लिंगानुपात 923, ओडिशा में 894, पंजाब में 904 और राजस्थान में 891 रहा। सिक्किम में यह आंकड़ा 969, तमिलनाडु में 878 और तेलंगाना में 894 रहा। त्रिपुरा में 1,028, उत्तर प्रदेश में 941, उत्तराखंड में 984 और पश्चिम बंगाल में 973 बेटियां प्रति 1,000 बेटे दर्ज की गईं।
केंद्र शासित प्रदेशों में भी आंकड़ों में काफी अंतर दिखाई देता है। अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में जन्म के समय लिंगानुपात 914, चंडीगढ़ में 838, दादरा एवं नगर हवेली तथा दमन एवं दीव में 817, गोवा में 838, लद्दाख में 1,125, लक्षद्वीप में 1,051 और पुडुचेरी में 959 दर्ज किया गया। इन छोटे क्षेत्रों के आंकड़ों में उतार-चढ़ाव को समझते समय वहां की छोटी आबादी और सर्वेक्षण की प्रकृति को भी ध्यान में रखना चाहिए।
इन आंकड़ों को ध्यान से देखने पर एक महत्वपूर्ण बात सामने आती है। कुछ राज्यों में पिछले NFHS-4 की तुलना में सुधार हुआ, जबकि कुछ राज्यों में जन्म के समय लिंगानुपात कम हुआ। उदाहरण के लिए उत्तर प्रदेश में यह अनुपात NFHS-4 के 903 से बढ़कर NFHS-5 में 941 हुआ। उत्तराखंड में 888 से बढ़कर 984 और हरियाणा में 836 से बढ़कर 893 हुआ। दूसरी ओर बिहार में यह 934 से घटकर 908 और तमिलनाडु में 954 से घटकर 878 हुआ। महाराष्ट्र में भी यह 924 से घटकर 913 रहा।
यह आंकड़े हमें यह सोचने पर मजबूर करते हैं कि केवल कानून बनाने से समस्या खत्म नहीं होगी। समाज की सोच में बदलाव भी जरूरी है। यदि परिवार में बेटा पैदा होने पर मिठाई बांटी जाती है और बेटी पैदा होने पर चिंता जताई जाती है, तो हमें सबसे पहले इसी सोच को बदलना होगा। जिस दिन बेटी का जन्म बेटे की तरह खुशी का अवसर बन जाएगा, उस दिन कन्या भ्रूण हत्या के खिलाफ हमारी लड़ाई मजबूत होगी।
भारत में बेटियों के अधिकारों की रक्षा के लिए कानून भी बनाए गए हैं। गर्भ में बच्चे के लिंग की पहचान करके उसके आधार पर गर्भपात कराने जैसी गतिविधियों पर रोक लगाने के लिए प्री-कन्सेप्शन एंड प्री-नेटल डायग्नोस्टिक टेक्निक्स कानून यानी PCPNDT Act लागू है। इस कानून का उद्देश्य लिंग चयन और भ्रूण के लिंग की जांच के दुरुपयोग को रोकना है। कानून तभी प्रभावी होगा जब समाज भी उसके पीछे मजबूती से खड़ा हो।
कन्या भ्रूण हत्या का एक बड़ा नुकसान यह है कि इससे समाज का लिंग संतुलन बिगड़ता है। जब किसी क्षेत्र में बेटियों की संख्या लगातार कम होती है तो आने वाले समय में विवाह योग्य महिलाओं और पुरुषों की संख्या में असंतुलन पैदा हो सकता है। इसका असर परिवार और विवाह व्यवस्था से लेकर सामाजिक सुरक्षा तक दिखाई दे सकता है। इसलिए बेटी को बचाना केवल एक परिवार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि पूरे समाज के भविष्य को सुरक्षित करने का काम है।
हमें यह समझना होगा कि बेटी केवल किसी एक परिवार की जिम्मेदारी नहीं है। वही बेटी आगे चलकर किसी परिवार की मां बनेगी, किसी बच्चे की पहली शिक्षिका बनेगी, किसी संस्था में अधिकारी बनेगी, किसी अस्पताल में डॉक्टर बनेगी, किसी विद्यालय में अध्यापिका बनेगी या देश के लिए महत्वपूर्ण काम करेगी। जिस बेटी को आज हम जन्म लेने का अवसर नहीं दे रहे हैं, संभव है कि कल वही समाज के लिए बहुत बड़ा योगदान देती।
मां-बाप को भी अपनी सोच बदलने की जरूरत है। बेटी की शिक्षा पर खर्च को खर्च नहीं, बल्कि निवेश समझना चाहिए। उसे अपने फैसले लेने, आगे बढ़ने और अपने पैरों पर खड़े होने का अवसर देना चाहिए। जब बेटी आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होती है तो वह स्वयं अपने जीवन का निर्णय लेने के साथ-साथ अपने परिवार का सहारा भी बन सकती है।
समाज में लड़कों की सोच बदलना भी उतना ही जरूरी है। लड़कों को बचपन से सिखाना होगा कि बहन और भाई में कोई छोटा-बड़ा नहीं होता। महिलाओं का सम्मान करना केवल संस्कार की बात नहीं, बल्कि एक स्वस्थ समाज की बुनियादी जरूरत है। यदि नई पीढ़ी बेटियों को बराबरी का अधिकार देगी तो आने वाले समय में कन्या भ्रूण हत्या जैसी सोच के लिए जगह कम होती जाएगी।
मीडिया, स्कूल, सामाजिक संगठन और सरकार भी इस बदलाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। गांवों और कस्बों में जागरूकता अभियान चलाए जाने चाहिए। लोगों को बेटियों की सफलता की कहानियां बताई जानी चाहिए। स्कूलों में बच्चों को लैंगिक समानता और महिला सम्मान की शिक्षा दी जानी चाहिए। स्वास्थ्यकर्मियों और चिकित्सा संस्थानों को भी अपने दायित्व का ईमानदारी से पालन करना चाहिए।
सबसे जरूरी बात यह है कि हम कन्या भ्रूण हत्या के खिलाफ केवल एक दिन अभियान न चलाएं। बेटी बचाने की सोच हमारे रोजमर्रा के व्यवहार का हिस्सा बननी चाहिए। घर में बेटा और बेटी दोनों को समान भोजन, समान शिक्षा, समान प्यार और समान अवसर मिलने चाहिए। बेटियों को संपत्ति, शिक्षा और निर्णय लेने के अधिकार से वंचित करने वाली सोच को भी बदलना होगा।
राज्यवार आंकड़े यह बताते हैं कि देश के अलग-अलग हिस्सों में स्थिति एक जैसी नहीं है। कहीं जन्म के समय लिंगानुपात बेहतर है तो कहीं चिंता पैदा करने वाला। इसलिए हर राज्य को अपनी स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार काम करने की जरूरत है। जहां आंकड़े कमजोर हैं, वहां सामाजिक जागरूकता, कानून का पालन और स्वास्थ्य व्यवस्था की निगरानी को और मजबूत किया जाना चाहिए। जहां स्थिति बेहतर है, वहां अच्छे प्रयासों को दूसरे क्षेत्रों तक पहुंचाया जा सकता है।
यह भी याद रखना जरूरी है कि आंकड़े केवल संख्या नहीं होते। हर संख्या के पीछे एक परिवार, एक मां और एक बच्चे की कहानी होती है। 1,000 के मुकाबले 900 बेटियों का आंकड़ा केवल 100 की कमी नहीं बताता, बल्कि यह उन बेटियों की ओर संकेत करता है जिन्हें जीवन का अवसर नहीं मिला या जिनके जन्म की परिस्थितियां असमान रहीं। इसलिए आंकड़ों को देखकर हमें केवल तुलना नहीं करनी चाहिए, बल्कि उनके पीछे छिपी सामाजिक सच्चाई को समझना चाहिए।
कन्या भ्रूण हत्या को खत्म करने के लिए सबसे पहले उस मानसिकता को खत्म करना होगा जो बेटी को बेटे से कम मानती है। हमें यह स्वीकार करना होगा कि परिवार का नाम केवल बेटा नहीं बढ़ाता, बेटी भी बढ़ाती है। माता-पिता का सहारा केवल बेटा नहीं बनता, बेटी भी बन सकती है। परिवार की खुशियां केवल बेटे से नहीं आतीं, बेटी भी घर को खुशियों से भर सकती है।
बेटी को जन्म देना किसी पर एहसान नहीं है। जन्म लेना हर बच्चे का अधिकार है। किसी बच्चे का भविष्य उसके लिंग से तय नहीं होना चाहिए। हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि गर्भ में पल रही बच्ची को भी वही जीवन मिले जिसका अधिकार एक बेटे को मिलता है।
कन्या भ्रूण हत्या के खिलाफ असली जीत उस दिन होगी जब किसी मां को बेटी पैदा करने पर डरना नहीं पड़ेगा, जब किसी पिता को बेटी को बोझ नहीं समझना पड़ेगा और जब किसी परिवार में बेटी के जन्म पर यह सवाल नहीं उठेगा कि अब उसके विवाह में कितना खर्च होगा। उस दिन बेटी केवल बचाई नहीं जाएगी, बल्कि सम्मान के साथ आगे बढ़ाई भी जाएगी।
हमें यह संकल्प लेना चाहिए कि बेटियों को जन्म लेने से नहीं रोकेंगे, उन्हें पढ़ने से नहीं रोकेंगे, उनके सपनों को छोटा नहीं करेंगे और उन्हें बेटे से कम नहीं समझेंगे। क्योंकि बेटी केवल आज की बच्ची नहीं, कल के समाज की निर्माता है। जिस समाज में बेटियों की कद्र होती है, वही समाज वास्तव में सभ्य, संवेदनशील और मजबूत कहलाने का अधिकारी है।
आंकड़े हमें चेतावनी देते हैं, लेकिन बदलाव हमारी सोच से आएगा। कानून रास्ता दिखा सकता है, सरकार योजनाएं चला सकती है और संस्थाएं जागरूकता फैला सकती हैं, लेकिन अंतिम फैसला परिवार और समाज की मानसिकता को ही करना होगा। इसलिए आज जरूरत है कि हम बेटी के जन्म से पहले उसके खिलाफ खड़े होने के बजाय उसके जन्म से पहले ही उसके स्वागत की तैयारी करें। बेटी को दुनिया में आने दें, उसे जीने दें, पढ़ने दें, बढ़ने दें और अपने सपनों को पूरा करने दें। यही एक स्वस्थ, समान और मानवीय समाज की पहचान होगी।
आंकड़ों का स्रोत: भारत सरकार, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा NFHS-4 और NFHS-5 के आधार पर संसद में प्रस्तुत राज्य/केंद्र शासित प्रदेशवार जन्म के समय लिंगानुपात। NFHS-5 का संदर्भ काल 2019-21 है और राष्ट्रीय आंकड़ा 929 बेटियां प्रति 1,000 बेटे है।







