
प्रयागराज: फर्जी शैक्षिक प्रमाणपत्रों के आधार पर बार कौंसिल ऑफ उत्तर प्रदेश में पंजीकरण कराकर वकालत करने के आरोप में सिविल लाइंस पुलिस की कार्रवाई जारी है। ऐसे मामलों में दर्ज प्राथमिकी की संख्या अब बढ़कर 99 हो गई है। बार कौंसिल ऑफ उत्तर प्रदेश के सचिव की शिकायत पर सिविल लाइंस थाने में एक और अधिवक्ता के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई है।
शिकायत के अनुसार, अल्लापुर निवासी एक अधिवक्ता ने वर्ष 1991 की एलएलबी की डिग्री का अंकपत्र सर्टिफिकेट ऑफ प्रैक्टिस (सीओपी) के आवेदन के साथ लगाया था। दस्तावेज के सत्यापन के लिए इसे इलाहाबाद विश्वविद्यालय भेजा गया। विश्वविद्यालय की जांच में अंकपत्र की छायाप्रति को गलत और असत्य बताया गया। बार कौंसिल के मुताबिक, संबंधित अधिवक्ता को सत्यापन समिति के संयोजक की ओर से 15 जनवरी 2025 को नोटिस भी भेजा गया था।
यह कार्रवाई इलाहाबाद हाईकोर्ट के मो. कफील बनाम स्टेट ऑफ यूपी व अन्य मामले में दिए गए आदेश के बाद तेज हुई है। अदालत ने बार कौंसिल ऑफ उत्तर प्रदेश में पंजीकृत उन अधिवक्ताओं के खिलाफ तत्काल एफआईआर दर्ज कराने का निर्देश दिया था, जिनकी शैक्षिक डिग्रियां बार कौंसिल ऑफ इंडिया के सर्टिफिकेट एंड प्लेस ऑफ प्रैक्टिस (वेरिफिकेशन) नियम, 2015 के तहत सत्यापन में फर्जी पाई गई हैं।
अदालत के निर्देश के बाद सिविल लाइंस पुलिस को बार कौंसिल की ओर से लगातार शिकायतें और सत्यापन रिपोर्ट मिल रही हैं। इन्हीं दस्तावेजों के आधार पर संबंधित अधिवक्ताओं के खिलाफ मुकदमे दर्ज किए जा रहे हैं। जांच में सामने आया है कि आरोपी अधिवक्ता केवल प्रयागराज के ही नहीं, बल्कि वाराणसी, कानपुर, लखनऊ, गाजियाबाद, मथुरा, लखीमपुर खीरी और फतेहपुर समेत कई अन्य जिलों के रहने वाले हैं।
सिविल लाइंस थाना प्रभारी रामाश्रय यादव के अनुसार, बार कौंसिल से उपलब्ध कराए जा रहे रिकॉर्ड और सत्यापन रिपोर्ट की जांच के बाद कार्रवाई की जा रही है। जिन अधिवक्ताओं की शैक्षिक डिग्री या अंकपत्र सत्यापन में फर्जी पाए जा रहे हैं, उनके खिलाफ नियमानुसार प्राथमिकी दर्ज की जा रही है।
मामले की जांच का दायरा अब और बढ़ने की संभावना है। 30 से अधिक कॉलेजों, विश्वविद्यालयों और अन्य शैक्षणिक संस्थानों से संबंधित अधिवक्ताओं की डिग्री और अंकपत्रों का दोबारा सत्यापन कराया जा सकता है। इसमें यह जांच की जाएगी कि संबंधित अधिवक्ताओं ने वास्तव में उन संस्थानों में दाखिला लिया था या नहीं और उनके नाम से जारी दस्तावेज मूल रिकॉर्ड से मेल खाते हैं या नहीं। अधिकारियों के स्तर पर यह भी संभावना जताई जा रही है कि जांच आगे बढ़ने पर एफआईआर की संख्या 100 के पार जा सकती है।
जांच के दौरान कुछ मामलों में स्नातक स्तर की डिग्रियों के अलावा 10वीं और 12वीं के प्रमाणपत्र और अंकपत्र भी संदेह के घेरे में आए हैं। सत्यापन के दौरान कई दस्तावेज संबंधित शैक्षणिक संस्थानों के रिकॉर्ड से मेल नहीं खा सके। ऐसे में अब यह पता लगाने की कोशिश की जा रही है कि फर्जी प्रमाणपत्र और अंकपत्र संबंधित लोगों तक कैसे पहुंचे।
जांच आगे बढ़ने पर फर्जी दस्तावेज तैयार करने और उपलब्ध कराने वाले लोगों की भूमिका भी सामने आ सकती है। पुलिस और बार कौंसिल के स्तर पर दस्तावेजों के स्रोत की पड़ताल की जा रही है। यदि अलग-अलग मामलों में एक ही माध्यम या व्यक्ति की संलिप्तता सामने आती है तो फर्जी शैक्षिक प्रमाणपत्र तैयार कराने वाले किसी संगठित नेटवर्क का भी खुलासा हो सकता है।







