

(नीलम गिरी)
हर दिशा से जुड़ रहा "उत्तराखण्ड"
देहरादून : उत्तराखंड में 8 जून से शुरू हुई एसआईआर (स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन) प्रक्रिया के दौरान जहां एक ओर मतदाता सूची को दुरुस्त करने और प्रत्येक पात्र मतदाता का विवरण सुनिश्चित करने का महत्वपूर्ण कार्य चल रहा था, वहीं दूसरी ओर इस प्रक्रिया को लेकर आम मतदाताओं के बीच कई तरह की आशंकाएं और गलतफहमियां भी देखने को मिलीं। कई लोगों के मन में यह डर बना हुआ था कि एसआईआर की प्रक्रिया के चलते कहीं उनका नाम मतदाता सूची से बाहर न हो जाए। इसी तरह की चर्चाओं और भ्रम के कारण कुछ इलाकों में मतदाताओं के बीच अनावश्यक चिंता का माहौल भी बना रहा।
ऐसे समय में एसआईआर को जमीनी स्तर पर सफल बनाने में बूथ लेवल ऑफिसरों (बीएलओ) की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण रही। बीएलओ ने घर-घर पहुंचकर मतदाताओं से संपर्क किया, उनकी समस्याओं और शंकाओं को सुना तथा प्रक्रिया के संबंध में आवश्यक जानकारी उपलब्ध कराई। इस दौरान कई बीएलओ ने न केवल सरकारी जिम्मेदारी निभाई, बल्कि मतदाताओं के बीच विश्वास कायम करने का भी काम किया। धर्मपुर विधानसभा क्षेत्र के ब्राह्मणवाला मतदान केंद्र के अंतर्गत महबूब कॉलोनी में तैनात बीएलओ नीलम गिरी की कार्यशैली इसी जिम्मेदारी और समर्पण की मिसाल बनकर सामने आई।
स्वरोजगार एवं उद्यमिता योजनाएँ
नीलम गिरी ने प्री-एसआईआर से लेकर एसआईआर प्रक्रिया के दौरान लगातार क्षेत्र में सक्रिय रहकर मतदाताओं से संपर्क बनाए रखा। घर-घर जाकर मतदाताओं से संवाद करना, उनके दस्तावेज और आवश्यक जानकारियां जुटाना तथा एसआईआर को लेकर उनके मन में उठ रहे सवालों का जवाब देना उनके कार्य का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा। खास बात यह रही कि उन्होंने केवल प्रक्रिया पूरी करने पर ध्यान नहीं दिया, बल्कि मतदाताओं के बीच फैली उस गलतफहमी को दूर करने का प्रयास भी किया, जिसके कारण एसआईआर को लेकर लोगों के मन में बेवजह का खौफ पैदा हो रहा था।
दरअसल, एसआईआर शुरू होने के बाद अलग-अलग स्तर पर तरह-तरह की बातें मतदाताओं तक पहुंच रही थीं। कई मतदाता यह समझने लगे थे कि इस प्रक्रिया का सीधा मतलब उनका वोट कट जाना है। इसी डर और भ्रम के कारण कुछ लोग अपने दस्तावेजों और मतदाता सूची में नाम को लेकर चिंतित नजर आए। ऐसे माहौल में बीएलओ के सामने केवल आंकड़े और दस्तावेज जुटाने की जिम्मेदारी नहीं थी, बल्कि लोगों का विश्वास जीतना भी एक बड़ी चुनौती थी। नीलम गिरी ने इस चुनौती को बेहद सहजता और धैर्य के साथ स्वीकार किया।
महबूब कॉलोनी में उन्होंने मतदाताओं के साथ लगातार संवाद कायम रखा। लोगों को एसआईआर की प्रक्रिया को समझाने के साथ यह भरोसा दिलाने का प्रयास किया कि उन्हें अनावश्यक रूप से घबराने की जरूरत नहीं है और निर्धारित प्रक्रिया के तहत आवश्यक जानकारी उपलब्ध कराना ही इसका महत्वपूर्ण हिस्सा है। उनके व्यवहार और संवाद के कारण कई मतदाताओं के मन में बना संशय दूर हुआ और लोगों ने भी प्रक्रिया में सहयोग करना शुरू किया।
नीलम गिरी की जिम्मेदारी इसलिए भी उल्लेखनीय है क्योंकि वह स्वयं एक शिक्षिका हैं। एक ओर विद्यालय में बच्चों की शिक्षा और उनकी जिम्मेदारियों का निर्वहन करना और दूसरी ओर चुनावी प्रक्रिया जैसे महत्वपूर्ण एवं संवेदनशील कार्य को पूरी गंभीरता से पूरा करना आसान नहीं होता। इसके बावजूद उन्होंने एसआईआर की जिम्मेदारी को पूरी निष्ठा के साथ निभाया और क्षेत्र के मतदाताओं के साथ लगातार संपर्क बनाए रखा।
एसआईआर जैसे महत्वपूर्ण अभियान की सफलता केवल सरकारी स्तर पर जारी दिशा-निर्देशों से संभव नहीं होती। इसकी वास्तविक सफलता उस समय दिखाई देती है जब बीएलओ और मतदाता के बीच भरोसे का रिश्ता कायम होता है। नीलम गिरी ने इसी भरोसे को मजबूत करने का प्रयास किया। उन्होंने मतदाताओं की बात सुनी, उनकी शंकाओं को समझा और प्रक्रिया को लेकर पैदा हुई गलतफहमियों को दूर करने में अपनी भूमिका निभाई। यही वजह है कि महबूब कॉलोनी में उनकी मेहनत को स्थानीय स्तर पर सराहना मिल रही है।
मतदाता सूची से संबंधित किसी भी प्रक्रिया में एक छोटी सी गलतफहमी भी लोगों के मन में बड़ी चिंता पैदा कर सकती है। ऐसे में बीएलओ का व्यवहार और उनका लोगों के साथ संवाद बेहद मायने रखता है। नीलम गिरी ने जिस तरह धैर्यपूर्वक मतदाताओं के बीच पहुंचकर काम किया, उससे यह संदेश भी गया कि चुनावी प्रक्रिया में बीएलओ और मतदाता एक-दूसरे के सहयोगी हैं। उनका उद्देश्य लोगों को डराना नहीं, बल्कि प्रक्रिया को पारदर्शी और व्यवस्थित तरीके से पूरा करना है।
एसआईआर को लेकर मतदाताओं के बीच जिस तरह की गफलत और आशंकाएं पैदा हो रही थीं, उन्हें दूर करने में क्षेत्र के बीएलओ की मेहनत अहम रही। नीलम गिरी ने अपने दायित्व को केवल एक सरकारी कार्य के रूप में नहीं देखा, बल्कि इसे लोकतांत्रिक व्यवस्था से जुड़ी जिम्मेदारी मानते हुए पूरी गंभीरता से निभाया। उनके प्रयासों से मतदाताओं में जागरूकता बढ़ी और एसआईआर को लेकर बना अनावश्यक भय भी काफी हद तक कम हुआ।
ब्राह्मणवाला मतदान केंद्र के अंतर्गत महबूब कॉलोनी में उनकी कार्यशैली यह बताती है कि किसी भी सरकारी प्रक्रिया को जमीनी स्तर पर सफल बनाने के लिए संवेदनशीलता, धैर्य और लोगों के साथ सीधा संवाद कितना जरूरी है। नीलम गिरी ने अपने काम के जरिए यह साबित किया कि यदि जिम्मेदारी को ईमानदारी और मानवीय संवेदना के साथ निभाया जाए तो लोगों के मन में पैदा हुई गलतफहमियों को दूर किया जा सकता है और किसी भी अभियान को सफल बनाया जा सकता है।
ऐसे समय में जब एसआईआर को लेकर मतदाताओं के बीच तरह-तरह की चर्चाएं और आशंकाएं थीं, नीलम गिरी जैसी बीएलओ की मेहनत निश्चित रूप से सराहनीय है। उन्होंने न केवल अपनी जिम्मेदारी पूरी की, बल्कि मतदाताओं का भरोसा जीतने और उन्हें प्रक्रिया से जोड़ने का भी काम किया। एक शिक्षिका के रूप में बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी के साथ-साथ चुनावी दायित्व को पूरी निष्ठा से निभाने के लिए नीलम गिरी का दिल से आभार और सम्मान किया जाना चाहिए।
लोकतंत्र की मजबूती केवल मतदान के दिन दिखाई नहीं देती, बल्कि मतदाता सूची को सही रखने से लेकर प्रत्येक पात्र मतदाता को चुनावी प्रक्रिया से जोड़ने तक हर स्तर पर होने वाले प्रयासों में भी इसकी नींव मजबूत होती है। नीलम गिरी जैसे बीएलओ इसी नींव को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। महबूब कॉलोनी में उनके द्वारा की गई मेहनत इस बात का उदाहरण है कि जब जिम्मेदारी के साथ संवेदनशीलता जुड़ जाती है तो लोगों के मन का डर दूर होता है और व्यवस्था के प्रति विश्वास और मजबूत होता है।
(सलीम रज़ा)








