
नई दिल्ली : उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता और भेदभाव रोकने के उद्देश्य से यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (UGC) द्वारा लागू किए गए संशोधित नियम अब देशभर में तीखी बहस का कारण बन गए हैं। इन नियमों को लेकर जहां एक वर्ग इसे सामाजिक न्याय की दिशा में जरूरी कदम बता रहा है, वहीं दूसरा वर्ग इसे एकतरफा और भेदभावपूर्ण करार दे रहा है। मामला अब केवल विश्वविद्यालय परिसरों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि राजनीतिक दलों, सामाजिक संगठनों और साहित्यिक जगत तक पहुंच चुका है।
इस बहस में अब मशहूर कवि और वक्ता कुमार विश्वास भी खुलकर सामने आए हैं। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक व्यंग्यात्मक कविता साझा कर नए नियमों पर असहमति जताई। कविता के जरिए उन्होंने सवर्ण समुदाय की चिंताओं को आवाज दी और UGC से नियमों पर पुनर्विचार की मांग का समर्थन किया। उनके पोस्ट के साथ #UGC_RollBack हैशटैग भी ट्रेंड करने लगा, जिससे साफ है कि असंतोष लगातार बढ़ रहा है।
क्यों बदले गए नियम?
दरअसल, UGC ने यह संशोधन सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के तहत किया है। रोहित वेमुला मामले की सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव को रोकने के लिए प्रभावी तंत्र विकसित करने को कहा था। इसके बाद UGC ने सभी विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में ‘इक्वैलिटी कमेटी’ का गठन अनिवार्य कर दिया।
नई व्यवस्था के तहत SC, ST और OBC वर्ग के छात्र अब सीधे इस समिति में शिकायत दर्ज करा सकते हैं। पहले यह सुविधा केवल SC और ST छात्रों तक सीमित थी। साथ ही, समिति में इन वर्गों का प्रतिनिधित्व अनिवार्य किया गया है, जबकि सामान्य वर्ग के प्रतिनिधित्व को जरूरी नहीं माना गया है।
कहां से उठा विरोध?
विरोध करने वालों का कहना है कि नियमों में संतुलन की कमी है। उनका तर्क है कि समानता की बात करते हुए किसी एक वर्ग को प्रतिनिधित्व से बाहर रखना खुद में भेदभाव है। इसके अलावा, नए नियमों में झूठी या निराधार शिकायतों पर कार्रवाई का स्पष्ट प्रावधान नहीं होने से भी असंतोष बढ़ा है। आलोचकों का कहना है कि इससे संस्थानों में डर और अविश्वास का माहौल बन सकता है।
राजनीतिक रंग भी गहराया
इस मुद्दे पर अब सियासत भी तेज हो गई है। विपक्षी दलों ने सरकार पर एकतरफा नीति थोपने का आरोप लगाया है। समाजवादी पार्टी के सांसद जियाउर रहमान बर्क ने चेतावनी दी कि यदि नियमों में सभी वर्गों के लिए समान सुरक्षा नहीं दी गई, तो इसका विरोध संसद से लेकर सड़कों तक किया जाएगा।
कुल मिलाकर, UGC के नए नियमों ने शिक्षा में समानता की बहस को एक नए मोड़ पर ला खड़ा किया है। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि आयोग इन आपत्तियों पर क्या रुख अपनाता है और क्या किसी संशोधन की गुंजाइश बनती है या नहीं।







