
बरेली : उत्तर प्रदेश के प्रशासनिक और राजनीतिक गलियारों में हलचल उस समय तेज हो गई जब बरेली के नगर मजिस्ट्रेट पद पर तैनात रहे पीसीएस अधिकारी अलंकार अग्निहोत्री के इस्तीफे ने सरकार, समाज और तंत्र—तीनों को एक साथ सवालों के घेरे में ला खड़ा किया। यह मामला अब केवल एक अधिकारी के त्यागपत्र तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि सामाजिक असंतोष, नीतिगत असहमति और प्रशासनिक संवेदनशीलता की व्यापक बहस का रूप ले चुका है।
26 जनवरी को दिए गए इस्तीफे के साथ अलंकार अग्निहोत्री ने सरकार और व्यवस्था के भीतर चल रही प्रवृत्तियों पर खुलकर सवाल उठाए। उन्होंने धार्मिक आस्थाओं से जुड़े हालिया घटनाक्रमों और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के प्रस्तावित नियमों को लेकर अपनी आपत्ति दर्ज कराई। इसके बाद से प्रदेश में अगड़ा-पिछड़ा विमर्श एक बार फिर राजनीतिक और सामाजिक चर्चाओं के केंद्र में आ गया है।
प्रशासनिक सूत्रों के अनुसार, अधिकारी के सार्वजनिक बयानों को सेवा आचरण के विरुद्ध मानते हुए सरकार ने त्वरित कार्रवाई करते हुए उन्हें निलंबित कर दिया। सरकार का कहना है कि किसी भी संवैधानिक पद पर बैठे अधिकारी को सार्वजनिक मंच से नीतियों और सरकार पर टिप्पणी करते समय मर्यादाओं का पालन करना होता है।
हालांकि, इस कार्रवाई ने नए सवाल भी खड़े कर दिए हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मामला ऐसे समय उभरा है जब उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनावों की तैयारी का दौर धीरे-धीरे शुरू हो चुका है और सामाजिक संतुलन सरकार के लिए एक संवेदनशील विषय बना हुआ है। यूजीसी के नए नियमों को लेकर सामान्य वर्ग और पिछड़े वर्ग के बीच बढ़ती असहजता ने इस विवाद को और गहरा कर दिया है।
इस पूरे घटनाक्रम के बीच जिला प्रशासन और अलंकार अग्निहोत्री के बीच हुई मुलाकात को लेकर परस्पर विरोधी बयान सामने आए हैं। जहां अधिकारी ने अपने साथ दुर्व्यवहार का आरोप लगाया, वहीं प्रशासनिक अधिकारियों ने इसे सामान्य और सौहार्दपूर्ण बातचीत बताया है। दोनों पक्षों के अलग-अलग दावों ने स्थिति को और जटिल बना दिया है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यह प्रकरण इस बात का संकेत है कि नीति निर्माण, प्रशासनिक संवाद और सामाजिक संवेदनाओं के बीच संतुलन बनाए रखना सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। असहमति के स्वर यदि समय रहते संवाद के माध्यम से नहीं सुने गए, तो वे टकराव का रूप ले सकते हैं।
फिलहाल यह मामला जांच के दायरे में है, लेकिन इतना स्पष्ट है कि अलंकार अग्निहोत्री का इस्तीफा केवल एक प्रशासनिक घटना नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश की राजनीति और सामाजिक विमर्श में एक नए अध्याय की शुरुआत बन चुका है।







