
अलीगढ़ : भारतीय क्रिकेट टीम के विस्फोटक बल्लेबाज Rinku Singh के जीवन पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा है। उनके पिता खानचंद सिंह का लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया। वे स्टेज-4 लिवर कैंसर से जूझ रहे थे और ग्रेटर नोएडा स्थित Yatharth Hospital में भर्ती थे, जहां देर रात उन्होंने अंतिम सांस ली। पिछले तीन दिनों से उनका इलाज चल रहा था। रिंकू की सफलता की कहानी में उनके पिता का संघर्ष, त्याग और अथक परिश्रम हमेशा केंद्रीय भूमिका में रहा।
अलीगढ़ की तंग गलियों से निकलकर अंतरराष्ट्रीय पहचान बनाने वाले रिंकू सिंह की यात्रा आसान नहीं रही। उनके पिता खानचंद सिंह एक गैस एजेंसी में हॉकर का काम करते थे और कंधों पर सिलेंडर ढोकर परिवार का पालन-पोषण करते थे। पांच बेटों और एक बेटी वाले परिवार में रिंकू तीसरे नंबर पर हैं। सीमित संसाधनों के बीच दो कमरों के मकान में गुजारा करने वाला यह परिवार आज भी अपने संघर्ष के दिनों को नहीं भूल पाया है। पिता दिनभर की कड़ी मेहनत के बाद जो भी कमाते, उसी में से बेटे के लिए बल्ला और गेंद खरीदते, ताकि उसका क्रिकेट खेलने का सपना जिंदा रह सके।
रिंकू को बचपन से ही क्रिकेट का जुनून था। उनके कोच मसूद जफर अमीनी के मुताबिक, पिता ही उन्हें अलीगढ़ के अहिल्याबाई होल्कर स्टेडियम लेकर आए, जहां से उनके पेशेवर क्रिकेट की शुरुआत हुई। अंडर-16 से लेकर अंडर-19 उत्तर प्रदेश, फिर रणजी और अंततः आईपीएल तक का सफर उन्होंने लगातार मेहनत से तय किया। स्कूल क्रिकेट वर्ल्ड कप में डीपीएस की ओर से खेलते हुए 35 नंबर की जर्सी पहनकर उन्होंने मैन ऑफ द सीरीज का खिताब जीता था। यही नंबर बाद में उनके लिए लकी साबित हुआ।
आईपीएल में उनका शुरुआती प्रदर्शन साधारण रहा, लेकिन 2023 में उन्होंने ऐसा कारनामा कर दिखाया जिसने उन्हें रातोंरात स्टार बना दिया। Indian Premier League के उस मुकाबले में Kolkata Knight Riders को आखिरी ओवर में 29 रन की जरूरत थी। सामने थी Gujarat Titans की टीम। जीत लगभग असंभव लग रही थी, यहां तक कि घरवालों ने भी उम्मीद छोड़ दी थी। लेकिन रिंकू सिंह ने आखिरी पांच गेंदों पर लगातार पांच छक्के जड़कर हारी हुई बाजी पलट दी। एक समय जब अंतिम गेंद पर चार रन चाहिए थे, उन्होंने उसे भी छक्के में बदल दिया। इस ऐतिहासिक पारी के बाद अलीगढ़ झूम उठा था। घर में जश्न मनाया गया, मिठाइयां बांटी गईं और बधाइयों का तांता लग गया।
रिंकू की इस सफलता के पीछे उनके पिता का वह त्याग छिपा था, जिन्होंने बेटे पर कभी जिम्मेदारियों का बोझ नहीं डाला। खुद सिलेंडर ढोते रहे, लेकिन रिंकू को सिर्फ क्रिकेट पर ध्यान देने दिया। महुआ खेड़ा स्थित अलीगढ़ स्पोर्ट्स एसोसिएशन मैदान पर अभ्यास करने वाले इस खिलाड़ी को आगे बढ़ाने में अर्जुन सिंह फकीरा और कोच मसूदुज्जफर अमीनी का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा।
आज जब रिंकू सिंह भारतीय क्रिकेट का चमकता सितारा हैं, तब उनके पिता का जाना एक गहरी व्यक्तिगत क्षति है। लेकिन यह भी सच है कि जिस संघर्ष और विश्वास की नींव पर रिंकू की सफलता खड़ी है, वह हमेशा उनके पिता की याद को जीवित रखेगी।






