

( सलीम रज़ा पत्रकार )
भारत आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ा दिखाई देता है जहाँ विकास, लोकतंत्र और सामाजिक न्याय के बड़े-बड़े दावों के बीच आम नागरिक की बुनियादी जरूरतें अब भी संघर्ष का विषय बनी हुई हैं। एक ओर देश को विश्वगुरु बनाने के सपने दिखाए जा रहे हैं, दूसरी ओर स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार और आर्थिक असमानता जैसे मुद्दे करोड़ों लोगों की जिंदगी को प्रभावित कर रहे हैं। सवाल यह नहीं है कि भारत विश्वगुरु बन सकता है या नहीं, बल्कि सवाल यह है कि क्या किसी राष्ट्र की वैश्विक प्रतिष्ठा उसकी जनता के जीवन स्तर से अलग होकर स्थापित की जा सकती है?
किसी भी विकसित और सशक्त राष्ट्र की पहचान उसकी सैन्य शक्ति, ऊँची इमारतों या बड़े-बड़े आयोजनों से नहीं होती, बल्कि इस बात से होती है कि वहां का नागरिक कितना सुरक्षित, शिक्षित, स्वस्थ और आत्मनिर्भर है। यदि किसी देश के अस्पतालों में डॉक्टरों और संसाधनों की कमी हो, यदि गरीब मरीज इलाज के अभाव में दम तोड़ रहे हों, यदि सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था लगातार दबाव में हो, तो यह चिंता का विषय है। उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड जैसे राज्यों में स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर समय-समय पर उठने वाले सवाल इस बहस को और गंभीर बना देते हैं। दूरदराज के क्षेत्रों में विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी, स्वास्थ्य केंद्रों की बदहाल स्थिति और महंगे इलाज का बोझ आम परिवारों के लिए बड़ी चुनौती बना हुआ है।
शिक्षा की स्थिति भी कम चिंताजनक नहीं है। शिक्षा किसी भी राष्ट्र की सबसे बड़ी पूंजी होती है, लेकिन जब सरकारी विद्यालयों की गुणवत्ता पर प्रश्न उठते हों, उच्च शिक्षा महंगी होती जा रही हो और प्रतियोगी परीक्षाओं में पेपर लीक तथा अनियमितताओं के आरोप लगातार सामने आते हों, तब युवाओं के भविष्य को लेकर चिंता स्वाभाविक है। लाखों छात्र वर्षों तक मेहनत करते हैं, लेकिन यदि व्यवस्था पर उनका विश्वास कमजोर होने लगे तो यह केवल व्यक्तिगत नुकसान नहीं बल्कि राष्ट्रीय क्षति भी है।
रोजगार का मुद्दा भी देश की सबसे बड़ी चुनौतियों में शामिल है। हर वर्ष लाखों युवा रोजगार बाजार में प्रवेश करते हैं, लेकिन उनके लिए पर्याप्त अवसर उपलब्ध नहीं हो पाते। बेरोजगारी केवल आर्थिक समस्या नहीं है, यह सामाजिक और मानसिक तनाव का भी कारण बनती है। जब युवाओं के सपने टूटते हैं तो उसका असर पूरे समाज पर पड़ता है। ऐसे में केवल बड़े आर्थिक आंकड़े प्रस्तुत कर देना पर्याप्त नहीं होता, बल्कि यह देखना भी जरूरी होता है कि विकास का लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंच रहा है या नहीं।
आर्थिक मोर्चे पर भी आम नागरिक अनेक चुनौतियों का सामना कर रहा है। महंगाई, बढ़ती जीवन-यापन लागत और आय में असमानता लोगों की चिंताओं को बढ़ाती है। देश की अर्थव्यवस्था के बढ़ने के दावों के बीच यह प्रश्न भी उठता है कि उस विकास का लाभ किसे मिल रहा है। जब कुछ बड़े उद्योगपति लगातार अधिक संपन्न होते जाएं और आम नागरिक अपनी मूलभूत जरूरतों के लिए संघर्ष करता रहे, तब आर्थिक न्याय की बहस तेज होना स्वाभाविक है। लोकतंत्र में यह अपेक्षा रहती है कि सरकारें विकास के अवसरों को व्यापक बनाएँ और समाज के सभी वर्गों को समान रूप से लाभान्वित करें।
इन सबके बीच सबसे चिंताजनक पहलू सामाजिक ध्रुवीकरण का है। जब राजनीति का केंद्र रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और विकास के बजाय धर्म, जाति और समुदाय आधारित मुद्दे बनने लगें, तब समाज का ध्यान वास्तविक समस्याओं से भटकने लगता है। लोकतंत्र में विविधता एक शक्ति होती है, लेकिन यदि इसी विविधता को टकराव का आधार बना दिया जाए तो सामाजिक सौहार्द कमजोर पड़ता है। इतिहास गवाह है कि जिन देशों ने अपनी ऊर्जा आपसी संघर्षों में खर्च की, वे विकास की दौड़ में पीछे रह गए।
भारत की सबसे बड़ी ताकत उसकी बहुलतावादी संस्कृति, लोकतांत्रिक परंपराएं और युवाशक्ति है। यदि देश को वास्तव में विश्वगुरु बनना है तो उसे केवल वैश्विक मंचों पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराने से आगे बढ़कर अपने नागरिकों के जीवन की गुणवत्ता को प्राथमिकता देनी होगी। विश्वगुरु वह राष्ट्र बनता है जो अपने नागरिकों को बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, सम्मानजनक रोजगार और समान अवसर प्रदान करे। विश्वगुरु वह बनता है जहाँ वैज्ञानिक सोच को प्रोत्साहन मिले, सामाजिक सद्भाव मजबूत हो और विकास का लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे।
आज आवश्यकता इस बात की है कि राष्ट्रीय विमर्श का केंद्र आम नागरिक की समस्याएं बनें। अस्पतालों की स्थिति, स्कूलों की गुणवत्ता, युवाओं के रोजगार, किसानों की आय और आर्थिक समानता जैसे मुद्दे राजनीतिक बहस के केंद्र में आएं। धर्म और पहचान के प्रश्न अपनी जगह महत्वपूर्ण हो सकते हैं, लेकिन वे नागरिकों की बुनियादी जरूरतों का विकल्प नहीं बन सकते।
भारत किस दिशा में जाएगा, इसका निर्णय केवल सरकारें नहीं करेंगी। यह निर्णय देश के नागरिक, युवा, बुद्धिजीवी, सामाजिक संगठन और लोकतांत्रिक संस्थाएं मिलकर करेंगे। यदि समाज विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार को अपनी प्राथमिकता बनाएगा तो देश निश्चित रूप से एक मजबूत और समृद्ध राष्ट्र बनेगा। लेकिन यदि वास्तविक मुद्दों की जगह भावनात्मक और विभाजनकारी बहसें हावी होती रहीं, तो विश्वगुरु बनने का सपना केवल एक नारा बनकर रह सकता है।
किसी भी महान राष्ट्र की पहचान उसके नारों से नहीं, बल्कि उसके नागरिकों के जीवन की वास्तविक परिस्थितियों से होती है। इसलिए भारत के भविष्य का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यही है कि क्या हम एक ऐसे राष्ट्र का निर्माण कर रहे हैं जहाँ हर नागरिक सम्मान, अवसर और सुरक्षा के साथ जीवन जी सके। यदि इसका उत्तर सकारात्मक है, तभी विश्वगुरु बनने का सपना सार्थक और स्थायी सिद्ध होगा।







