

(सलीम रज़ा, पत्रकार)
हर दिशा से जुड़ रहा "उत्तराखण्ड"
“मुझे अपनी बैंक की किताब दीजिए,
देश की तबाही का हिसाब दीजिए।”
शायर मंजर भोपाली का यह शेर महज़ दो पंक्तियाँ नहीं, बल्कि लोकतंत्र में नागरिक की उस आवाज़ का प्रतीक है जो सत्ता से सवाल पूछने का साहस रखती है। यह शेर उस बेचैनी को शब्द देता है जो तब पैदा होती है जब मेहनत करने वाला इंसान अपने भविष्य को असुरक्षित महसूस करता है। यह केवल आर्थिक हिसाब मांगने की बात नहीं करता, बल्कि उस नैतिक जवाबदेही की मांग करता है जो हर लोकतांत्रिक व्यवस्था की बुनियाद होती है। आज दिल्ली के जंतर-मंतर पर चल रहा छात्र आंदोलन भी कुछ इसी भावना का विस्तार दिखाई देता है। वहाँ बैठे हजारों छात्र केवल अपनी मांगों का ज्ञापन नहीं दे रहे, बल्कि व्यवस्था से यह पूछ रहे हैं कि उनकी वर्षों की मेहनत, उनके सपनों और उनके भविष्य का हिसाब कौन देगा।
स्वरोजगार एवं उद्यमिता योजनाएँ
भारत दुनिया का सबसे युवा देश कहलाता है। हर साल लाखों विद्यार्थी अपने जीवन के सबसे सुनहरे वर्ष प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में लगा देते हैं। कोई छोटे से गाँव से शहर आता है, कोई परिवार की जमा-पूंजी कोचिंग और किताबों पर खर्च करता है, तो कोई अपने माता-पिता के सपनों को पूरा करने के लिए दिन-रात एक कर देता है। उनके लिए परीक्षा केवल प्रश्नपत्र नहीं होती, बल्कि उनके पूरे भविष्य का दरवाज़ा होती है। लेकिन जब परीक्षा प्रक्रिया पर सवाल उठते हैं, पेपर लीक की घटनाएँ सामने आती हैं, पारदर्शिता पर संदेह होता है या छात्रों को लगता है कि उनकी मेहनत के साथ न्याय नहीं हुआ, तब सबसे बड़ा नुकसान केवल एक परीक्षा का नहीं होता, बल्कि उस भरोसे का होता है जिस पर पूरी शिक्षा व्यवस्था खड़ी होती है।
जंतर-मंतर पर बैठे छात्रों के चेहरों को ध्यान से देखा जाए तो वहाँ गुस्से से ज़्यादा चिंता दिखाई देती है। उनके हाथों में तख्तियाँ हैं, नारों में आक्रोश है, लेकिन आँखों में अपने भविष्य की चिंता साफ़ पढ़ी जा सकती है। वे किसी विशेष सुविधा की मांग नहीं कर रहे, वे केवल निष्पक्षता चाहते हैं। वे चाहते हैं कि यदि उन्होंने वर्षों तक मेहनत की है तो उसका मूल्यांकन ईमानदारी से हो। वे चाहते हैं कि यदि व्यवस्था में कोई कमी है तो उसे स्वीकार किया जाए और उसे दूर करने के लिए ठोस कदम उठाए जाएँ। यही लोकतंत्र की सबसे स्वाभाविक मांग है।
लोकतंत्र केवल चुनावों से नहीं चलता। लोकतंत्र तब मजबूत होता है जब नागरिक सवाल पूछने का अधिकार रखते हैं और सरकार उन सवालों का जवाब देने के लिए तैयार रहती है। जंतर-मंतर वर्षों से ऐसे आंदोलनों का गवाह रहा है जहाँ समाज के अलग-अलग वर्ग अपनी समस्याओं को लेकर पहुँचे हैं। किसानों ने अपनी बात रखी, सैनिकों ने अपनी आवाज़ उठाई, शिक्षकों ने अपने अधिकार मांगे और अब छात्र अपने भविष्य की सुरक्षा की मांग कर रहे हैं। यह लोकतंत्र की कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी ताकत है कि लोग अपनी बात शांतिपूर्ण तरीके से कह सकते हैं।
छात्रों की सबसे बड़ी शिकायत केवल किसी एक घटना को लेकर नहीं है। उनकी चिंता यह है कि यदि परीक्षा प्रणाली पर से भरोसा उठ गया तो आने वाली पीढ़ियों का विश्वास कैसे कायम रहेगा। हर साल लाखों युवा प्रतियोगी परीक्षाओं में बैठते हैं। वे केवल अंक हासिल नहीं करते, बल्कि अपने परिवारों की उम्मीदें लेकर परीक्षा केंद्र तक पहुँचते हैं। जब उन्हें लगता है कि पूरी प्रक्रिया निष्पक्ष नहीं है तो उनके भीतर यह भावना जन्म लेती है कि कहीं उनकी मेहनत बेकार तो नहीं चली जाएगी। यही भावना किसी भी समाज के लिए सबसे खतरनाक होती है, क्योंकि जब मेहनत पर से विश्वास उठ जाता है तो व्यवस्था पर भी विश्वास कमजोर होने लगता है।
युवाओं का गुस्सा केवल वर्तमान की प्रतिक्रिया नहीं है, बल्कि भविष्य की चिंता भी है। वे जानते हैं कि यदि आज व्यवस्था में सुधार नहीं हुआ तो कल फिर वही स्थिति दोहराई जा सकती है। इसलिए उनकी मांगें केवल तत्काल समाधान तक सीमित नहीं हैं। वे चाहते हैं कि परीक्षा प्रणाली को इतना मजबूत बनाया जाए कि भविष्य में किसी छात्र को इस तरह सड़क पर उतरने की नौबत ही न आए। तकनीकी सुधार हों, जवाबदेही तय हो, पारदर्शिता बढ़े और किसी भी तरह की लापरवाही पर सख्त कार्रवाई हो। यह मांग किसी भी लोकतांत्रिक समाज में अनुचित नहीं कही जा सकती।
इस पूरे आंदोलन का एक मानवीय पक्ष भी है जिसे अक्सर राजनीतिक बहसों में नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है। आंदोलन में शामिल अधिकांश छात्र ऐसे परिवारों से आते हैं जिनके लिए शिक्षा ही सामाजिक और आर्थिक बदलाव का सबसे बड़ा माध्यम है। उनके माता-पिता अपनी जरूरतों में कटौती करके बच्चों को पढ़ाते हैं। कई छात्र किराये के कमरों में रहकर वर्षों तक तैयारी करते हैं। अनेक युवाओं की पूरी जवानी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में बीत जाती है। ऐसे में यदि व्यवस्था पर सवाल उठते हैं तो उनकी पीड़ा केवल व्यक्तिगत नहीं रहती, बल्कि पूरे समाज की चिंता बन जाती है।
सरकार की भी अपनी जिम्मेदारियाँ हैं और अपनी चुनौतियाँ भी। इतने बड़े देश में विशाल परीक्षा प्रणाली का संचालन आसान काम नहीं है। लाखों परीक्षार्थियों, हजारों परीक्षा केंद्रों और जटिल प्रशासनिक व्यवस्थाओं के बीच त्रुटियों की संभावना से पूरी तरह इनकार नहीं किया जा सकता। लेकिन लोकतंत्र में किसी भी व्यवस्था की विश्वसनीयता इस बात से तय होती है कि वह अपनी कमियों को किस तरह स्वीकार करती है और उन्हें सुधारने के लिए कितनी गंभीरता से कदम उठाती है। जनता और विशेष रूप से युवा केवल आश्वासन नहीं, बल्कि भरोसेमंद कार्रवाई देखना चाहते हैं।
आंदोलन की सफलता केवल इस बात में नहीं होगी कि कौन-सी मांग मानी गई और कौन-सी नहीं। उसकी वास्तविक सफलता तब होगी जब इस पूरे घटनाक्रम से शिक्षा और परीक्षा प्रणाली में स्थायी सुधार होंगे। यदि इस संघर्ष के बाद भविष्य की परीक्षाएँ अधिक सुरक्षित, पारदर्शी और विश्वसनीय बनती हैं तो यह केवल आंदोलन की नहीं, बल्कि पूरे देश की जीत होगी।
मंजर भोपाली का शेर इस पूरे परिदृश्य में एक बार फिर गूंजता है—
“मुझे अपनी बैंक की किताब दीजिए,
देश की तबाही का हिसाब दीजिए।”
यह शेर व्यवस्था के खिलाफ विद्रोह का नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक जवाबदेही का प्रतीक है। इसमें एक नागरिक की वह आवाज़ है जो कहती है कि देश केवल भाषणों से नहीं, बल्कि विश्वास से चलता है; केवल घोषणाओं से नहीं, बल्कि पारदर्शिता से मजबूत होता है। जंतर-मंतर पर बैठे छात्र भी आखिर यही कह रहे हैं कि उन्हें किसी विशेष कृपा की आवश्यकता नहीं, बल्कि एक ऐसी व्यवस्था चाहिए जिस पर वे भरोसा कर सकें। क्योंकि किसी भी राष्ट्र की सबसे बड़ी पूंजी उसके युवा होते हैं, और यदि युवाओं का विश्वास टूटने लगे तो यह केवल एक पीढ़ी का संकट नहीं, बल्कि पूरे देश के भविष्य का प्रश्न बन जाता है। इसलिए आज जरूरत केवल मांगों पर निर्णय लेने की नहीं, बल्कि उस भरोसे को फिर से स्थापित करने की है जो किसी भी लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत होता है।








