
हैदराबाद: कानून के छात्रों के विरोध से शुरू हुआ विवाद गुरुवार को कुछ ही घंटों के भीतर बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) के सख्त फरमान और फिर नाटकीय यू-टर्न तक पहुंच गया। हैदराबाद स्थित प्रतिष्ठित NALSAR यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ के 2026 बैच के छात्रों के अधिवक्ता के रूप में नामांकन पर रोक लगाने के फैसले ने कानूनी जगत में स्वतंत्र अभिव्यक्ति, न्यायपालिका के सम्मान और छात्रों के असहमति के अधिकार को लेकर नई बहस छेड़ दी। हालांकि, देर शाम BCI ने अपना आदेश वापस लेते हुए पूरे बैच को नामांकन की अनुमति दे दी।
CJI को दीक्षांत समारोह में बुलाने पर छात्रों ने जताई आपत्ति
विवाद की शुरुआत 23 जुलाई को हुई, जब NALSAR के 70 अंतिम वर्ष के छात्रों ने कुलपति, रजिस्ट्रार और शिक्षकों को पत्र लिखकर दीक्षांत समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत को आमंत्रित किए जाने पर आपत्ति जताई। बाद में अन्य बैचों के छात्रों ने भी इस प्रतिनिधित्व का समर्थन किया।
छात्रों की आपत्ति 20 जुलाई को जंतर-मंतर पर छात्र प्रदर्शन के दौरान कथित पुलिस ज्यादती से जुड़ी याचिका की सुनवाई के दौरान CJI सूर्यकांत की कथित टिप्पणी से संबंधित थी। छात्रों के अनुसार, जब याचिकाकर्ता के वकील ने पुलिस कार्रवाई का वीडियो फुटेज अदालत के सामने पेश करने की बात कही, तो पीठ की ओर से वीडियो देखने में रुचि नहीं होने की बात कही गई।
छात्रों ने इसे पुलिस कार्रवाई से जुड़े गंभीर आरोपों के प्रति असंवेदनशील रवैया बताया। उनका कहना था कि ऐसे व्यक्ति से डिग्री प्राप्त करना NALSAR में पढ़ाए जाने वाले संवैधानिक मूल्यों और स्वतंत्र विचार की भावना के साथ उनके लिए असहज स्थिति पैदा करता है।
BCI ने पूरे बैच के नामांकन पर लगाई रोक
छात्रों के विरोध के बाद BCI अध्यक्ष मनन कुमार मिश्रा ने NALSAR को पत्र भेजकर 2026 बैच के सभी छात्रों के अधिवक्ता के रूप में नामांकन पर अगले आदेश तक रोक लगाने का निर्देश दिया। राज्य बार काउंसिलों को भी इन छात्रों का नामांकन नहीं करने को कहा गया।
BCI ने विश्वविद्यालय से उन लोगों की तथ्यात्मक रिपोर्ट भी मांगी, जिन्होंने कथित अभियान को शुरू, संगठित, समन्वित या संचालित किया था। रिपोर्ट में प्रतिनिधित्व पर हस्ताक्षर करने वाले छात्रों, बैठकों, सोशल मीडिया समूहों, मीडिया संवाद, बहिष्कार या व्यवधान की अपील और शिक्षकों, शोधार्थियों, पूर्व छात्रों, छात्र संगठनों तथा बाहरी लोगों की संभावित भूमिका की जानकारी मांगी गई।
BCI अध्यक्ष ने अपने शुरुआती पत्र में कड़ा रुख अपनाते हुए कहा था कि देश के सर्वोच्च न्यायिक पद के प्रति सम्मान न रखने वाला कानून छात्र भविष्य में जिम्मेदार अधिवक्ता, शिक्षक या न्यायाधीश बनने की अपेक्षा पूरी नहीं कर सकता और ऐसे लोग कानूनी पेशे के लिए “liability” बन सकते हैं।
हालांकि, परिषद ने यह भी स्पष्ट किया था कि महज किसी प्रतिनिधित्व पर हस्ताक्षर करने या अभियान का समर्थन करने से कोई छात्र स्वतः Advocates Act की धारा 24A के तहत अयोग्य नहीं हो जाता।
कुछ घंटों बाद BCI का यू-टर्न
BCI के आदेश के बाद विवाद और तेज हो गया। सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रिया और विरोध की चेतावनियों के बीच परिषद ने देर शाम अपना फैसला संशोधित कर दिया।
संशोधित पत्र में BCI ने कहा कि नवीनतम रिपोर्टों के अनुसार NALSAR के 2026 बैच के अधिकांश छात्र निर्दोष हैं और कथित “अनादर” की पहल में शामिल होने के इच्छुक नहीं थे। परिषद ने यह भी माना कि कुछ शिक्षकों और बाहरी लोगों ने निर्दोष छात्रों को प्रभावित या उकसाया हो सकता है।
इसके बाद पूरे 2026 बैच को अपनी पसंद की राज्य बार काउंसिल में अधिवक्ता के रूप में नामांकन कराने की अनुमति दे दी गई।
BCI ने कहा कि वरिष्ठ अधिवक्ताओं, बार सदस्यों, कानून छात्रों और आम लोगों से प्राप्त प्रतिक्रियाओं पर विचार करने के बाद 2026 बैच के खिलाफ कार्रवाई समाप्त करने का फैसला किया गया है। हालांकि, शिक्षकों और बाहरी लोगों की कथित भूमिका को लेकर उठे सवाल अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुए हैं।
SCBA अध्यक्ष ने भी फैसले पर उठाए सवाल
BCI के शुरुआती फैसले की सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (SCBA) के अध्यक्ष विकास सिंह ने भी कड़ी आलोचना की। उन्होंने इसे “अवैध, असंगत और मौलिक रूप से अस्थिर” करार देते हुए कहा कि विश्वविद्यालय स्वतंत्र विचार और निर्भीक बहस के केंद्र होने चाहिए।
हालांकि, उन्होंने CJI सूर्यकांत को दीक्षांत समारोह में आमंत्रित किए जाने का विरोध करने वाले छात्रों के रुख का समर्थन नहीं किया।
‘Cockroach Janta Party’ की टिप्पणी भी चर्चा में
पूरे विवाद के बीच ‘Cockroach Janta Party’ के संस्थापक अभिजीत दिपके की प्रतिक्रिया ने भी सोशल मीडिया पर ध्यान खींचा। उन्होंने BCI के आदेश पर सवाल उठाते हुए लिखा— “What if all legal cockroaches come together?”
यह टिप्पणी उस पुराने विवाद की ओर इशारा करती है, जिसमें CJI की कथित “cockroaches” टिप्पणी के बाद अभिजीत दिपके ने सोशल मीडिया पर इसी सवाल को उठाया था और बाद में ‘Cockroach Janta Party’ आंदोलन का गठन किया।
असहमति और संस्थागत सम्मान के बीच संतुलन का सवाल
NALSAR प्रकरण ने एक अहम संवैधानिक और कानूनी सवाल को फिर सामने ला दिया है—कानून के छात्रों से सर्वोच्च न्यायिक संस्था और उसके पदाधिकारियों के प्रति सम्मान की अपेक्षा कहां तक उचित है और स्वतंत्र असहमति के अधिकार की सीमा कहां से शुरू होती है?
BCI का पहले पूरे बैच के नामांकन पर रोक लगाना और फिर उसी दिन फैसला बदल देना इस बहस को और गहरा करता है। एक ओर न्यायपालिका की गरिमा और संस्थागत अनुशासन का सवाल है, तो दूसरी ओर कानून के छात्रों के स्वतंत्र विचार, शांतिपूर्ण असहमति और लोकतांत्रिक बहस के अधिकार का मुद्दा है।
फिलहाल NALSAR के 2026 बैच को नामांकन की राहत मिल गई है, लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने कानूनी शिक्षा संस्थानों में असहमति की भूमिका और बार में प्रवेश के मानकों को लेकर एक व्यापक बहस जरूर छेड़ दी है।







