
नई दिल्ली: मानवाधिकार दिवस के अवसर पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने कहा कि मानवाधिकारों की रक्षा केवल सरकार या राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग जैसी संस्थाओं की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि हर नागरिक का साझा दायित्व है। उन्होंने जोर देकर कहा कि समाज के प्रत्येक व्यक्ति के अधिकारों और गरिमा की रक्षा करना हम सभी का कर्तव्य है और इसी भावना से एक दयालु, न्यायपूर्ण और समान समाज का निर्माण संभव है।
नई दिल्ली में एनएचआरसी द्वारा आयोजित कार्यक्रम में राष्ट्रपति ने कहा कि मानवाधिकार दिवस हमें यह याद दिलाता है कि सार्वभौमिक मानवाधिकार अविभाज्य हैं और एक संवेदनशील समाज की आधारशिला हैं। कार्यक्रम में एनएचआरसी के अध्यक्ष न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) वी. रामासुब्रमण्यन और प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव पी.के. मिश्रा भी उपस्थित थे। मानवाधिकार दिवस हर वर्ष 10 दिसंबर को 1948 की मानवाधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा को स्मरण करने के लिए मनाया जाता है।
राष्ट्रपति ने कहा कि मानवाधिकारों की भावना सामाजिक लोकतंत्र को मजबूत बनाती है। इसमें भयमुक्त जीवन का अधिकार, निर्बाध शिक्षा का अधिकार और शोषण से मुक्त होकर काम करने जैसे अधिकार शामिल हैं। उन्होंने कहा कि ‘विकसित भारत’ के निर्माण के लिए समग्र विकास और सामाजिक न्याय की दिशा में आगे बढ़ना आवश्यक है।
उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि मानवाधिकारों के प्रति भारत की प्रतिबद्धता को विश्व स्तर पर सराहा जा रहा है। इसका उदाहरण संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद में भारत का सातवीं बार निर्विरोध चुना जाना है, जो देश की सक्रिय भूमिका और विश्वसनीयता का प्रमाण है।





